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शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

श्रद्धांजलि देने का नायाब तरीका


ब्रिटेन के एक पूर्व सैनिक ने अफगानिस्तान में मारे गए सैनिकों को श्रद्धांजलि देने का नायाब तरीका खोजा है। शान क्लार्क अपने शरीर पर अब तक अफगानिस्तान में मारे गए 223 सैनिकों के नाम गुदवा चुके हैं। उनकी ख्वाहिश है कि वह ऐसे प्रत्येक सैनिक का नाम गुदवाएं। उन्होंने बताया कि उन्हें पहला नाम गुदवाने में थोड़ा दर्द हुआ लेकिन उसके बाद वह सैनिकों को याद करते हुए चार घंटे तक अपने शरीर पर नाम गुदवाते रहे।

क्लार्क का यह सिलसिला यहीं खत्म होने वाली नहीं है। अभी कई शहीद सैनिकों के नाम बाकी हैं। क्लार्क 1989 से 1996 तक ब्रिटेन की लाइट इनफेंटरी रेजीमेंट में सेवा दे चुके हैं। उन्होंने कहा कि इसके लिए मुझे कुछ दिन की पीड़ा सहनी पड़ेगी। लेकिन मेरा दर्द सैनिकों और उनके परिवार वालों के दर्द के आगे बहुत कम है। उनके देशप्रेम को देखते हुए टैटू बनाने वाले ने उनसे कोई शुल्क नहीं लिया। उसका कहना है कि वो भी क्लार्क की मदद करना चाहता है।

क्लार्क का इरादा न सिर्फ सैनिकों को श्रद्धांजलि देना है, बल्कि वह इसके जरिए कुछ पैसे कमाकर सैनिकों के परिवार वालों की मदद भी करना चाहते हैं। उन्होंने बताया, 'इस हरकत को देखकर मेरे परिवार का मानना था कि मैं पागल हो चुका हूं। लेकिन अब वो भी मेरे साथ हैं। मेरी बीवी मुझे हमेशा इसके लिए प्रोत्साहित करती रहती है।' दो बच्चों के पिता क्लार्क को उम्मीद है कि इसके जरिए वह 'हेल्प फार हीरोज' चैरिटी को 500 पौंड [करीब 40 हजार रुपये] तक कमाकर दे सकेंगे। उन्होंने कहा कि अपने शरीर के आधे भाग पर 223 नाम गुदवाना कुछ अटपटा जरूर लगता है लेकिन यह मेरा अपना तरीका है।

बकौल क्लार्क, 'सैनिकों की मदद कई लोग करते हैं लेकिन मैं कुछ अलग करना चाहता था। यह केवल पैसा कमाने के लिए नहीं है बल्कि इसके जरिए मैं जनता को उन लोगों की याद दिलाना चाहता हूं जिनकी वजह से उसकी आजादी बरकरार है।' इसके अलावा क्लार्क ने चैरिटी के लिए वेबसाइट भी जारी की है। उनकी वेबसाइट पर कई लोगों की प्रतिक्रियाएं भी आ चुकी हैं। सभी ने क्लार्क के इस कदम को सराहनीय बताया है।

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हर एक का देश प्रेम अलग अलग होता है - किसी में कम तो किसी में ज्यादा - पर होता जरूर है | आपने कभी सोचा यह आता कहाँ से है ?? वह कौन सी बात है जो हमे 'देश प्रेमी' बनाती है ?? क्या है वह जज्बा कि हम अपने देश के नाम को सुनते ही भावुक जाते है और इस के खिलाफ कुछ भी बर्दाशत करना गवारा नहीं करते ??

शायद इन सब बातो का केवल एक ही जवाब है और वह है हमारे 'संस्कार' !!

बचपन से ही हमे यह सिखाया जाता है कि अपने देश से प्रेम करो और अगर जरूरत आ पड़े तो इसके लिए बलिदान हो जाओ | बाकी सब सीखों कि तरह यह भी एक सीख ही है पर एक अलग दर्जे की - यह विश्व पटल पर आपकी पहचान से जुड़ी हुयी है ! इस लिए हमे यह कोशिश करनी चाहिए कि हम भी अपने बच्चो को एसे ही संस्कार दे कि आगे चल कर वह हमारा ही नहीं बल्कि देश का भी नाम रोशन करे |

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दिनांक :- ०१/११/२००९ ; स्थान :- इंडिया गेट ; समय :- शाम के ७ बजे - एक १७ - १८ साल की लड़की मोबइल पर 'किसी' को अपनी लोकेशन बता रही है," मैं इंडिया गेट पर हूँ ......कहाँ से क्या मतलब ??.......इंडिया गेट पर ......अच्छा वैसे ....वो जहाँ वो आग जल रही है न ........दिख रहा है .......बस उसी के सामने !!"

आप समझे मैडम कहाँ खड़ी थी ?? जी हाँ ..............सही समझे ........'अमर जवान ज्योति' के सामने !! थोड़ा अजीब तो आप को भी लगा होगा कि कैसे बड़े आराम से 'अमर जवान ज्योति' को सिर्फ़ मामूली सी जलती आग का रूप दे दिया गया ! पर क्या करे साहब यही तो है आज की 'जेनरेशन Y' !

तो सिर्फ़ एक विनती है आप भले ही किसी भी जेनरेशन के क्यों न हो पर रहेंगे तो भारतीय ही न सो अपने देश के प्रति सोये हुए अपने देश प्रेम को जगाये और विश्व में अपना और अपने देश का नाम रोशन करे |

वैसे जब जब जरूरत पड़ी हम तो अपनी आदत अनुसार कहते ही रहेगे.........जागो सोने वालों ........


5 टिप्‍पणियां:

  1. ये क्लॉर्क महोदय को इंडिया गेट पर लाकर खड़ा कर दीजिए...शायद इसी से हम हर वक्त शहीदों की कुरबानी को याद रख सकें...

    जय हिंद...

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  2. यह भी एक जूनून है शिवम् जी , जिसके दो कारण हो सकते है एक मात्र सस्ती लोकप्रियता हाशिल करना और दूसरा सचमुच की देश भक्ति !

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  3. आपकी इस पोस्ट ने तो अभिभूत ही कर दिया....शब्दशः सहमत हूँ आपसे.....
    हालाँकि इस जुमले का राजनितिक इस्तेमाल अधिक होता है पर यह सत्य है कि ..... जो माँ,मानुष और माटी से प्रेम न करेगा,उनके लिए श्रद्धा न रखेगा , उसका जीवन अपने लिए भी और औरों के लिए भी निरर्थक है...

    प्रेरणादायी प्रसंग और कर्तब्य को इतने सुन्दर ढंग से उधृत कर स्मरण करने के लिए कोटिशः आभार....

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