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शनिवार, 23 नवंबर 2013

समाज मे कीचड़ या कीचड़ मे समाज

आज कल समाज मे ऐसे ही लोगो की भीड़ दिखती है ... जिन की असली जगह हमारा समाज नहीं ... वही कीचड़ है जहां से वो सब आए है | और सब से बड़ी दिक्कत यह है कि ऐसे लोग किसी वर्ग विशेष मे नहीं मिलते बल्कि समाज के हर वर्ग मे पाये जा रहे है ... हाल की घटनाएँ इस का प्रमाण है |

 
अगर जल्द ही इन का कोई ठोस इलाज़ न निकाला गया तो इस समाज को बर्बाद होने से कोई नहीं बचा सकता |
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जागो सोने वालों ...

गुरुवार, 2 मई 2013

क्या पाया उन बेटियों ने ...



कोई पूछे जा कर उन बेटियों से ...
आज क्या है उनके दिल मे ...
जब से होश संभाला ...
एक ही आस रही कि पापा घर आ जाएँ ... 

 

जिस तस्वीर को पापा कहते है उस तस्वीर मे प्राण आ जाये ...
आज आएंगे पापा ...
निष्प्राण हो कर ...
एक कैद से आज़ाद हो कर ...

 

एक ताबूत मे फिर कैद हो कर ...
फिर एक तस्वीर बनने के लिए ...
क्या पाया उन बेटियों ने ...

  

पापा को खो कर ...
पा कर ...
फिर खो कर !!?? 

( सरबजीत सिंह और उनके परिवार को समर्पित मेरी यह स्वरचित रचना ) 


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जागों सोने वालों ...