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बुधवार, 21 अक्तूबर 2009

विश्व में कहां ठहरते हैं हमारे विश्वविद्यालय

Posted by at 1:13 am

पिछले सप्ताह जब से 'द टाइम्स-क्यूएस' की दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की वैश्विक रैंकिंग जारी हुई है, देश में अपने विश्वविद्यालयों की दशा को लेकर हंगामा मचा हुआ है। वजह यह कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ पहले 10 या 50 या 100 या फिर 150 विश्वविद्यालयों की सूची में भारत का कोई विश्वविद्यालय जगह नही बना पाया है।
यही नहीं, सर्वश्रेष्ठ 200 विश्वविद्यालयों की सूची में 163वें स्थान पर आईआईटी मुंबई और 181वें स्थान पर आईआईटी दिल्ली को जगह मिल सकी है, जबकि लोकप्रिय और वास्तविक अर्थो में आईआईटी को विश्वविद्यालय नहीं माना जाता है।
यह सचमुच चिंता और अफसोस की बात है कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ 200 विश्वविद्यालयों की सूची में दो आईआईटी को छोड़कर देश का कोई विश्वविद्यालय जगह बना पाने में कामयाब नहीं हुआ है। इससे देश में उच्च शिक्षा की मौजूदा स्थिति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है, लेकिन इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है।
ऐसा नहीं है कि यह सच्चाई सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की वैश्विक रैंकिंग जारी होने के बाद पहली बार सामने आई है। यह एक तथ्य है कि पिछले कई वर्षो से जारी हो रही इस वैश्विक रैंकिंग में भारत के विश्वविद्यालय अपनी जगह बना पाने में लगातार नाकामयाब रहे हैं।
सवाल है कि इस वैश्विक रैंकिंग को कितना महत्व दिया जाए? यह भी एक तथ्य है कि 'द टाइम्स-क्यूएस' की विश्वविद्यालयों की सालाना वैश्विक रैकिंग रिपोर्ट और ऐसी अन्य कई रिपोर्टो की प्रविधि और चयन प्रक्रिया पर सवाल उठते रहे हैं। इस रैकिंग में विकसित और पश्चिमी देशों के विश्वविद्यालयों के प्रति झुकाव और आत्मगत मूल्याकन की छाप को साफ देखा जा सकता है, लेकिन इन सबके बावजूद दुनिया भर के शैक्षणिक समुदाय में इस वैश्विक विश्वविद्यालय रैंकिंग की मान्यता और स्वीकार्यता बढ़ती ही जा रही है। उसकी अपनी ही एक करेंसी हो गई है।
दरअसल, इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि पिछले दो दशकों में उच्च शिक्षा का जो वैश्विक बाजार बना है, उसके लिए विश्वविद्यालयों की इस तरह की रैंकिंग एक अनिवार्य शर्त है। यह रैंकिंग वैश्विक शिक्षा बाजार के उन उपभोक्ताओं के लिए है, जो बेहतर अवसरों के लिए विश्वविद्यालय चुनते हुए इस तरह की रैंकिंग को ध्यान में रखते हैं।
निश्चय ही, इस तरह की रैंकिंग से सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों को न सिर्फ संसाधन जुटाने में आसानी हो जाती है, बल्कि वे दुनिया भर से बेहतर छात्रों और अध्यापकों को भी आकर्षित करने में कामयाब होते हैं। इस अर्थ में, सर्वश्रेष्ठ 200 विश्वविद्यालयों की सूची में आईआईटी को छोड़कर एक भी भारतीय विश्वविद्यालय के न होने से साफ है कि भारत उच्च शिक्षा के वैश्विक बाजार में अभी भी आपूर्तिकर्ता नहीं, बल्कि उपभोक्ता ही बना हुआ है।
आश्चर्य नहीं कि सरकार के तमाम दावों के बावजूद अभी भी देश से हर साल लाखों छात्र उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका से लेकर आस्ट्रेलिया तक के विश्वविद्यालयों की ओर रुख कर रहे हैं। यही नहीं, 'ब्रेन ड्रेन' रोकने और 'ब्रेन गेन' के दावों के बीच अब भी सैकड़ों प्रतिभाशाली शिक्षक और शोधकर्ता विदेशों का रुख कर रहे हैं।
इस मायने में वैश्विक विश्वविद्यालयों की यह रैंकिंग उच्च शिक्षा के कर्ता-धर्ताओं को न सिर्फ वास्तविकता का सामना करने का एक मौका देती है, बल्कि एक तरह से चेतावनी की घटी है। वह इसलिए कि दोहा दौर की व्यापार वार्ताओं के तहत सेवा क्षेत्र को व्यापार के लिए खोलने की जो बातचीत चल रही है, उसमें भारत अपने उच्च शिक्षा क्षेत्र को खोलने के लिए तत्पर दिख रहा है।
इस तत्परता का अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल विदेशी विश्वविद्यालयों को देश में बुलाने के लिए कुछ ज्यादा ही उत्साहित दिख रहे हैं।
लेकिन सवाल यह है कि जब भारत और उसके विश्वविद्यालय वैश्विक शिक्षा बाजार में कहीं नहीं हैं तो उच्च शिक्षा का घरेलू बाजार विदेशी शिक्षा सेवा प्रदाताओं या विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए खोलने के परिणामों के बारे में क्या यूपीए सरकार ने विचार कर लिया है?
क्या ऐसे समय में, जब भारतीय विश्वविद्यालय विकास और गुणवत्ता के मामले में विकसित और पश्चिमी देशों के विश्वविद्यालयों से काफी पीछे हैं, उस समय विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए देश के दरवाजे खोलने का अर्थ उन्हें एक असमान प्रतियोगिता में धकेलना नहीं होगा? क्या इससे देसी विश्वविद्यालयों के विकास पर असर नहीं पड़ेगा?
निश्चय ही इन सवालों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है, लेकिन ऐसा लगता है कि यूपीए सरकार उच्च शिक्षा में बुनियादी सुधार और बेहतरी के लिए देसी विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता बढ़ाने के वास्ते उन्हें जरूरी संसाधन और संरक्षण मुहैया कराने के बजाय गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का जिम्मा विदेशी विश्वविद्यालयों को सौंपकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहती है।
हालाकि कपिल सिब्बल उच्च शिक्षा में सुधार के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि वे उच्च शिक्षा क्षेत्र में बुनियादी सुधार के बजाय जहां-तहां पैबंद लगाने की कोशिश कर रहे हैं। हकीकत यह है कि यूपीए सरकार को उच्च शिक्षा में पैबंद लगाने और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप और निजी क्षेत्र को बढ़ाने जैसे पिटे-पिटाए फार्मूलों को फिर से आजमाने के बजाय उन बुनियादी सवालों और समस्याओं से निपटने की ईमानदार कोशिश करनी चाहिए, जिनकेकारण उच्च शिक्षा एक शैक्षणिक जड़ता से जूझ रही है।
आज वास्तव में जरूरत यह है कि इस शैक्षणिक जड़ता को तोड़ने के लिए उच्च शिक्षा और विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक पुनर्जागरण के लिए उपयुक्त माहौल बनाया जाए। इसके लिए विश्वविद्यालयों के व्यापक जनतात्रिक पुनर्गठन के साथ-साथ उन्हें वास्तविक स्वायत्तता और शैक्षणिक स्वतंत्रता उपलब्ध कराना जरूरी है।
असल में, आज देश में उच्च शिक्षा के सामने तीन बुनियादी चुनौतिया हैं- उच्च शिक्षा के विस्तार, उसमें देश के सभी वर्गो के समावेश और उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने की। इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि सरकार उच्च शिक्षा के लिए पर्याप्त संसाधन और वित्तीय मदद मुहैया कराए, लेकिन अफसोस की बात यह है कि आर्थिक सुधारों की शुरुआत के बाद 90 के दशक में उच्च शिक्षा के बजट में लगातार कटौती हुई, जिसका नतीजा यह हुआ कि अधिकाश विश्वविद्यालयों में न सिर्फ पठन-पाठन पर असर पड़ा, बल्कि वे छोटी-छोटी शैक्षणिक जरूरतों और संसाधनों से भी महरूम हो गए।
एक अंतरराष्ट्रीय शोध रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के विकसित देशों की तो बात ही छोड़ दीजिए, ब्रिक देशों [ब्राजील, रूस, भारत और चीन] में उच्च शिक्षा में प्रति छात्र सबसे कम व्यय भारत में होता है। आश्चर्य नहीं कि वैश्विक विश्वविद्यालयों की रैंकिंग में पहले 200 विश्वविद्यालयों की सूची में हमारे पड़ोसी देश चीन के कई विश्वविद्यालयों के नाम हैं, लेकिन भारत के विश्वविद्यालय उस सूची में जगह नहीं बना पाए।
ऊपर से तुर्रा यह कि यूपीए सरकार अब विश्वविद्यालयों को अपने बजट का कम से कम 20 प्रतिशत खुद जुगाड़ने के लिए कह रही है।
यही नहीं, इस समय उच्च शिक्षा पर बजट बढ़ाने और 11वीं पंचवर्षीय योजना में शिक्षा को सबसे अधिक महत्व देने के यूपीए सरकार के तमाम बड़े-बड़े दावों के बावजूद सच यह है कि सरकार उच्च शिक्षा पर जीडीपी का 0.39 प्रतिशत से भी कम खर्च कर रही है। इसकी तुलना में, चीन उच्च शिक्षा पर इसके तीन गुने से भी अधिक खर्च कर रहा है।
असल में, वैश्विक रैकिंग में जगह न बना पाने से अधिक चिंता की बात यह है कि आजादी के 60 सालों बाद भी उच्च शिक्षा के विस्तार की हालत यह है कि देश में विश्वविद्यालय जाने की उम्र के सिर्फ दस फीसदी छात्र ही कालेज या विश्वविद्यालय तक पहुंच पाते हैं, जबकि विकसित और पश्चिमी देशों में 35 से 50 फीसदी छात्र विश्वविद्यालयों में पहुंचते हैं। आश्चर्य नहीं कि मानव विकास सूचकाक में भी भारत 183 देशों की सूची में 134वें स्थान पर है।
आखिर मानव विकास में फीसड्डी होकर कोई देश सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की वैश्विक रैंकिंग में जगह कैसे बना सकता है?
 
जो हमसे हैं बेहतर

'द टाइम्स-क्यूएस' 2009 की इस रैंकिंग में अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी पहले स्थान पर बरकरार है। ब्रिटेन की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी एक पायदान चढ़कर दूसरे स्थान पर आ गई है। वहीं, अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी एक पायदान खिसककर तीसरे नंबर पर पहुंच गई है। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन को इंपीरियल कॉलेज, लंदन के साथ पाचवें स्थान पर संयुक्त रूप से जगह दी गई है।
रिपोर्ट में ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों की तारीफ कहा गया है कि इस रैंकिंग में ब्रिटेन ने अपना वजन बढ़ाया है, लेकिन इसके बावजूद वह अमेरिका से पीछे है। टाप-10 और टाप-100 में ब्रिटेन के क्रमश: चार और 18 विश्वविद्यालयों ने जगह बनाई है। टाप-100 में एशियाई विश्वविद्यालयों की संख्या 14 से बढ़कर 16 हो गई है। इनमें टोक्यो यूनिवर्सिटी ने इस रैंकिंग में शीर्ष 22वा स्थान हासिल किया है, जबकि हागकाग यूनिवर्सिटी को 24वा स्थान मिला है।
 
वहां शिक्षण के प्रति समर्पण ज्यादा है

पश्चिमी और यूरोपीय विश्वविद्यालयों का इतिहास भले ही 500-600 वर्ष पुराना हो, लेकिन पश्चिमी शिक्षा जिसे हम बार-बार आदर्श के रूप में देखते हैं, वह बहुत पुरानी नहीं हैं। इसमें समय के साथ बदलाव भी होते रहे हैं। दूसरे, विदेशों में उच्च शिक्षा में शोध को बहुत महत्व दिया जाता है।
ऐसा नहीं है कि विदेशों में लोग अध्यापन को पैसों से नहीं जोड़ते, लेकिन वहां अध्यापकों में शिक्षा के लिए समर्पण हमसे ज्यादा है। सबसे बड़ी बात तो यह भी है कि पश्चिमी देशों में शोधकार्यो को भी बढ़ावा दिया जाता रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन शोध से जुड़ी किसी भी जरूरतों में कोई कमी नहीं छोड़ते हैं।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रख्यात अर्थशास्त्री जेके मेहता अर्थशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष थे। उस समय जो लोग टॉप किया करते थे, उनका चयन विदेशी विश्वविद्यालयों में तदर्थ रूप से पढ़ाने के लिए हो जाया करता था। एक विद्यार्थी जिसका चयन विदेशी विश्वविद्यालय में शिक्षक और आईएएस, दोनों ही जगहों पर हो गया, वह मेहता साहब से सलाह लेने गया कि मैं किसी बतौर कैरियर अपनाऊं?
मेहता साहब ने पूछा- विश्वविद्यालय में तो तुम्हारा चयन स्थाई रूप से हो ही जाएगा। उसके बाद तुम रीडर बनना चाहोगे, और फिर प्रोफेसर। छात्र ने कहा, 'हां।' मेहता साहब ने कहा इसका मतलब तुम नौकरी करना चाहते हो शिक्षक नहीं बनना चाहते। जब नौकरी ही करना चाहते हो तो तुम्हारे लिए आईएएस ही ठीक है।
भारतीय विश्वविद्यालयों के प्रदर्शन में कमी का एक और जो बड़ा कारण है, वह यह कि हमारे यहां का अच्छा छात्र तो विदेश चला जाता है और औसत छात्र यहीं रह जाता है। जबकि हमारे यहां जो विदेशी छात्र आते हैं, वे सामान्य दर्जे के होते हैं। पहले जो अध्यापक होते थे, वे भले ही पीएचडी न हों, लेकिन शोध करने और सीखने के प्रति उनकी रुचि रहती थी। वह शिक्षा और छात्रों के भविष्य के प्रति गंभीर रहते थे, लेकिन अब इन प्रवृत्तियों में गिरावट आई है। इसके पीछे कहीं न कहीं सरकारी उदासीनता और लोगों की व्यक्तिगत स्तर पर मानसिकता में बदलावों को भी जिम्मेवार ठहराया जा सकता है।
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भाई साहब, जब यूपीए सरकार की पालनहार खुद और उनका बेटा तक विदेश में पढ़ा हुआ हो तो क्या फर्क पड़ता है अगर यहाँ का युवा भी विदेश जा कर पढना चाहे ?? हुआ करे 'ब्रेन ड्रेन' !! किस को फर्क पड़ता है यहाँ ?! अगर शिक्षा के ऊपर पड़ा कफ़न हटाया गया तो कौन झेलेगा आती हुयी बदबू को ?? चिंता है उच्च शिक्षा की मौजूदा स्थिति की जबकि बेसिक शिक्षा का हाल और भी बुरा है !!
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कपिल सिब्बल साहब, उच्च शिक्षा तो हमारे युवा तब लेगे ना जब उनके पास बेसिक शिक्षा हो ?? सो कदम कदम चले.... बहुत लम्बी कूदने की ना सोचे !! 
वैसे आप मंत्री है .....ज्यादा जानते है .....हम तो सिर्फ़ जनता है जो आप करोगे हमारी भलाई के लिए ही करोगे .....एसा हम मानते है !! 
बाकी कोई बात बुरी लगी हो तो अज्ञानी समझ माफ़ करे वह क्या है ना हमे तो उच्च शिक्षा मिली ही नहीं !! अपन तो बस एसे ही आदत के मारे कहते है .................जागो सोने वालो ..........

रविवार, 18 अक्तूबर 2009

लालच की पराकाष्ठा

Posted by at 12:25 pm
यह आश्चर्यजनक है और चिंताजनक भी कि सुख-संपन्नता के सबसे बड़े पर्व को कुछ लोगों ने अपने लालच को पूरा करने के कारोबार में तब्दील कर दिया है। यह शर्मनाक है कि उत्तर प्रदेश के विभिन्न इलाकों में नकली एवं दूषित दूध, खोये, मिठाई आदि का कारोबार बेरोकटोक ढंग से होता हुआ नजर आ रहा है। यह कारोबार कितने बड़े पैमाने पर हो रहा है, इसका पता इससे चलता है कि विभिन्न शहरों में मारे गए छापों के दौरान 80 हजार लीटर नकली तेल एवं वनस्पति घी, तीन हजार किलो देसी घी, 15 सौ किलो नकली खोया और बड़ी मात्रा में नकली दूध की बरामदगी की गई। इस बरामदगी से तो ऐसा लगता है कि यदि और अधिक छापे मारे जाते तो और ज्यादा नकली खोया, घी, दूध आदि बरामद होता। ध्यान रहे कि मिलावटखोरों के खिलाफ देर से कार्रवाई शुरू की गई और इसका एक प्रमाण स्वयं मुख्यमंत्री मायावती की ओर से किया गया यह सवाल है कि खाद्य एवं औषधि नियंत्रण विभाग के अधिकारी अब तक क्या कर रहे थे?
मुख्यमंत्री की इसके लिए सराहना की जानी चाहिए कि उन्होंने मिलावटखोरों के खिलाफ सख्ती बरतने और यहां तक कि उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई करने के आदेश दिए। ऐसे आदेशों के बाद यह आवश्यक हो जाता है कि मिलावटखोरों के खिलाफ जारी अभियान और अधिक गति पकड़े। वैसे भी यह लगभग तय है कि दीवाली के बाद भी मिलावटखोर अपनी हरकतों से बाज आने वाले नहीं हैं। निस्संदेह उनका दुस्साहस इसलिए बढ़ गया है, क्योंकि खाद्य एवं औषधि नियंत्रण सरीखे विभाग अपना कार्य सही तरीके से नहीं कर रहे हैं। होना तो यह चाहिए कि इस विभाग एवं पुलिस को ऐसा माहौल बना देना चाहिए कि मिलावटखोर हानिकारक खाद्य पदार्र्थो का निर्माण एवं बिक्री करने में भय खाएं। पता नहीं ऐसा होगा या नहीं, लेकिन यह सवाल तो उठना ही चाहिए कि आखिर खाद्य पदार्र्थो में जहरीली वस्तुएं मिलाने में भी संकोच क्यों नहीं किया जा रहा? क्या इससे अधिक घृणित कार्य और कोई हो सकता है? यह तो धनलिप्सा की पराकाष्ठा है। बेहतर हो कि जो लोग भी ऐसा हीन कार्य कर रहे हैं उन्हें सार्वजनिक रूप से भी धिक्कारा जाए।
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अरे भाई, दिवाली हो, होली हो या ईद हो जब तक यह मिलावटखोर अपना माल नहीं बेचेगे तब तक इन लोगो का, खाद्य एवं औषधि नियंत्रण विभाग वालो का, पुलिस वालो का और इन के बाकी मौसेरे भाइयो का घर खर्च कैसे चलेगा ??  तो थोडा बहुत आप भी सहयोग करे और खूब ख़रीदे मिलावटी दूध, खोये, मिठाई आदि !!

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इन जैसे लोगो को जितनी भी सजा दी जाये कम है बस जरूरत है इन लोगो पर पूरी इमानदारी से करवाई करने की ! अब जब  मुख्यमंत्री खुद इन लोगो पर करवाई की बात कह रही है तो उम्मीद भी यही की जा रही है कि करवाई होगी और जल्द होगी !! 
हम तो बस यही कहेगे कि .....जागो सोने वालो ......

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2009

अंधेरे में रहेगा शहीदों का आंगन

Posted by at 3:17 pm


दिवाली पर सारा देश जगमगाएगा, लेकिन राष्ट्रीय स्मारक जलियांवाला बाग अंधेरे में डूबा रहेगा। 90 साल पहले जिन परवानों ने देश के लिए शहादत दी, उनके नाम को आजतक सरकार रोशन नहीं कर पाई।
बची-खुची कसर शहीदों के परिजनों ने पूरी कर दी। अपने पूर्वजों के नाम पर उन्हें सरकार से मदद की तो भरपूर आस है, लेकिन देश की आजादी के लिए जहां दादा-नाना ने खून बहाया, उस पावन धरती पर श्रद्धा के दो दीप तक जलाने के लिए शहीदों के परिजनों ने कभी कोई प्रयास नहीं किया।
जी हां, दिवाली के मौके पर रोशनी से हर-घर आंगन जगमगाएगा, लेकिन शहीदी स्थल जलियांवाला बाग में शहादत देने वालों की याद में कोई भी शख्स वहां श्रद्धा के दो दीपक नहीं जलाता। सरकार भी अपने स्तर पर यहां दीपमाला के लिए कोई प्रयास नहीं करती। पर उस सरकार से भला हम यह आस भी कैसे करें जो आज तक जलियांवाला बाग के शहीदों के नाम को उजागर तक नहीं कर पाई। हैरानी की बात यह है कि जलियांवाला बाग कांड के 90 वर्ष बाद सरकार ने शहीदों की सूची लगाने का निर्णय लिया था।
काफी शोर-शराबे के बाद शिलापंट्ट तो बनकर तैयार है, लेकिन सूची अभी तक इससे नदारद है। शहीदों के परिजन तो सरकार से भी दो कदम आगे निकले। शहीद के परिजन पूर्वजों के शहादत को भुनाने के तिकड़म में अभी तक जुटे हैं। वह सरकार से ढेर सारी सुविधाएं पाने की जुगत में हैं। दिवाली पर उनके घर तो जगमगाते हैं, लेकिन पूर्वजों ने जिस पावन धरती पर देश के लिए शहादत दी वहां श्रद्धा के दो दीपक जलाना मुनासिब नहीं समझते। यही बस नहीं शहीदों को सरमाया बताने वाले और राष्ट्रीयता का दंभ भरने वालों की भी कमी नहीं है, लेकिन वह भी शहीदी स्थल में कभी दिए जलाने नहीं पहुंचे।
जलियांवाला बाग की जगमगाहट पर नजर डालें तो यहां शाम ढलने के बाद उजाले के नाम पर मद्धिम रोशनी ही जलती है। लिहाजा शाम ढलते ही शहीदी स्थल से प्रकाश गायब हो जाता है। सरकार ने लाइट एंड साउंड प्रोग्राम के माध्यम से शहीदी स्थल की छटा को निखारने का निर्णय लिया है, लेकिन इसमें अभी वक्त लगेगा। वैसे बता दें कि जलियांवाला बाग में बिजली की सप्लाई का खर्च निगम वहन कर रहा है। लाइट एंड साउंड प्रोग्राम के लिए यहां पर निर्बाध तौर पर बिजली सप्लाई के लिए बिजली बोर्ड ने अलग से ट्रांसफार्मर भी लगवाए हैं। केंद्र सरकार द्वारा शहीदी स्थल के लिए 5 करोड़ की लागत से किए जा रहे विकास कार्य के तहत शहीदी लाट, शहीदी कुआं, समाधि, दीवारें व पाथ पर नए लाइटे लगाई गई हैं, लेकिन क्या कृत्रिम प्रकाश शहीदों की आत्मा को रोशन कर पाएगा?
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आज सिर्फ़ यह कह कर काम नहीं चल सकता कि ............जागो सोने वालो  .......... इस लिए साथ साथ यह भी कहेता हूँ कि ..... ज़रा याद उन्हें भी कर लो .........

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

टीम इंडिया के उपकप्तान हैं धौनी !!

Posted by at 12:42 pm

अगर आपको जानकारी नहीं हो तो हम बता देते हैं कि महेंद्र सिंह धौनी टीम इंडिया के उपकप्तान हैं। चकरा गए ना। मगर मानो या ना मानो, यह सच है। उन्हीं के राज्य झारखंड राज्य क्रिकेट एसोसिएशन [जेएससीए] का आधिकारिक अंतरजाल [वेबसाइट] तो यही बताता है।
संघ की आधिकारिक अंतरजाल के भंवरजाल में फंसे तो फिर यह किसी मायाजाल से कम नहीं प्रतीत होगा। पिछले पांच वर्षो से राज्य की सबसे धनी संस्था [परिसंपति लगभग 70 करोड़] की आधिकारिक वेबसाइट अपडेट तक नहीं हुई है। धौनी को कप्तान बने तीन वर्ष पूरे होने को हैं, पर वेबसाइट में आज भी उन्हें उपकप्तान बनने पर बधाई दी जा रही है। इसके अलावा दो बार आईसीसी प्लेयर ऑफ द ईयर का खिताब जीतने वाले माही का ना तो कहीं जिक्र है और ना ही उनकी कोई फोटो ही है।
अगर हैदराबाद क्रिकेट एसोसिएशन या फिर कर्नाटक क्रिकेट एसोसिएशन की वेबसाइट पर नजर डालें तो होम पेज में आपको उनके राज्य के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटरों की न सिर्फ फोटो मिलेगी, बल्कि प्रोफाइल भी आसानी से उपलब्ध हो जाएगा। क्रिकेट की बाइबिल विस्डन के ड्रीम टीम के कप्तान का सम्मान पा चुके पद्मश्री धौनी का प्रोफाइल जेएससीए की वेबसाइट में उपलब्ध नहीं है। यही नहीं जेएससीए ने धौनी को दो साल पूर्व सम्मानित सदस्य का दर्जा दिया था, पर वेबसाइट में इसका जिक्र तक नहीं किया गया है।
वेबसाइट पर गलत सूचनाओं के मकड़जाल का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दो वर्ष पहले पूर्व अंतरराष्ट्रीय टेस्ट क्रिकेटर रमेश सक्सेना व पूर्व अंतरराष्ट्रीय वनडे क्रिकेटर रणधीर सिंह की सदस्यता संघ के विरुद्ध गतिविधियों में संलिप्तता का आरोप लगाकर छीन ली गई थी। पर वेबसाइट के अनुसार जहां रमेश सक्सेना अभी भी जेएससीए के सदस्य हैं, वहीं रणधीर सिंह की सदस्यता छीन ली गई है। पूर्व क्रिकेटर सबा करीम जिन्होंने कभी जेएससीए का नाम रोशन किया था, का नाम भी सदस्यता सूची से गायब है।
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अब साहब क्या कहे, बहुत ही छोटी सी बात है .... जाने भी दीजिये ...क्या करना ....अब वेबसाइट में नहीं है तो क्या हुआ सच तो सब जानते ही है !!
जिस भारत देश में आज भी ४०० रुपये की पेंशन के लिए किसी ७२ साल के आदमी को यह साबित करना होता है कि वो ही पेंशन का हक़दार है तो अगर लाखो में कमाने वाले धोनी एक बार यह साबित कर दें कि वो कैप्टेन है तो कौन सी बड़ी बात हो जायेगी ??
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बाकी झारखंड राज्य क्रिकेट एसोसिएशन [जेएससीए] वालो से यही कहना है कि .............जागो सोने वालो .........

रविवार, 11 अक्तूबर 2009

दुस्साहस का प्रमाण

Posted by at 3:07 pm
मेरठ में एक युवा और उदीयमान क्रिकेटर की जिस तरह हत्या हुई वह उत्तर प्रदेश के क्रिकेट जगत के साथ-साथ आम जनता को भी झकझोर देने वाली है। प्रतिभाशाली गगनदीप महज इसलिए गोलियों का शिकार हो गया, क्योंकि वह एक ऐसी दुकान पर मौजूद था जहां अपराधी तत्वों को दुकानदार की देरी रास नहीं आई। इस घटना से स्थानीय पुलिस-प्रशासन के साथ-साथ राज्य सरकार को भी चेतना चाहिए, क्योंकि गगनदीप की हत्या जिन परिस्थितियों में हुई उससे पता चलता है कि अपराधी तत्वों का दुस्साहस किस हद तक बढ़ गया है? मेरठ की इस घटना से यह भी साफ है कि जिन अपराधी तत्वों ने गगनदीप और दुकानदार की गोली मारकर हत्या कर दी उनके मन में पुलिस और कानून एवं व्यवस्था का कहीं कोई भय नहीं था। यह स्थिति क्यों बनी, इस पर राज्य सरकार को भी चिंतित होना चाहिए और स्थानीय पुलिस-प्रशासन को भी। यदि अपराधी तत्वों का दुस्साहस हद से अधिक बढ़ता जा रहा है तो इसके लिए राज्य सरकार ही उत्तरदायी है। यह आवश्यक है कि राज्य सरकार उन सवालों पर ध्यान दे जो कानून एवं व्यवस्था की स्थिति को लेकर उठ रहे हैं।
इस पर संतोष नहीं जताया जा सकता कि मेरठ में दो लोगों की हत्या कर देने वाले एक अभियुक्त को गिरफ्तार कर लिया गया है और पुलिस की ओर से यह दावा भी किया जा रहा है कि उसने अपना अपराध कबूल कर लिया है, क्योंकि यह सुनिश्चित करना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है कि इस घटना को अंजाम देने वाले अपराधी तत्वों को कठोरतम दंड मिले। केवल इसलिए नहीं कि ऐसे तत्वों ने एक प्रतिभाशाली खिलाड़ी को मौत की नींद सुला दिया, बल्कि इसलिए भी, क्योंकि वे सभ्य समाज के लिए खतरा हैं। फिलहाल यह कहना कठिन है कि मेरठ की इस घटना से पुलिस कहीं कोई सबक लेगी, लेकिन कम से कम उत्तर प्रदेश क्रिकेट संघ को तो यह सबक लेना ही चाहिए कि इस प्रकार के दौरों में कैसी सतर्कता बरती जानी चाहिए। उत्तर प्रदेश की अंडर-22 क्रिकेट टीम के इस दौरे में यदि अपेक्षित सतर्कता बरती गई होती तो गगनदीप जैसे खिलाड़ी को मौत का शिकार होने से बचाया जा सकता था।
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क्या कहे .....सिर्फ़ इतना कि दोबारा एसा ना हो इसलिए ......जागो सोने वालो .......

शनिवार, 10 अक्तूबर 2009

'आई-जेनरेशन' = 'इंस्टालमेंट जेनरेशन'

Posted by at 1:33 pm
छोटी के बदले बड़ी चादर का एक्सचेंज ऑफर हो और शेष धनराशि आसान किश्तों में चुकाने की सुविधा, तो 'अपनी चादर देख कर पाँव पसारने' की कहावत भला किसको याद रहेगी? कम से कम दोहरी कमाई वाले भारतीय शहरी दंपतियों की युवा पीढ़ी को तो बिल्कुल नहीं, जिन पर टिकी हैं बैंकों और बाजार की निगाहें!



जी हाँ, आधुनिक जीवनशैली को अपनाने की इच्छा भारतीय शहरों में एक नई पीढ़ी को गढ़ चुकी है और इसको नाम दिया गया है 'आई-जेनरेशन'आप इसके दो अर्थ निकालने को स्वतंत्र हैं, पहला आई है 'इंडिपेंडेट' और दूसरा आई है 'इंस्टालमेंट'। यह 'इंस्टालमेंट जेनरेशन' का ही जलवा है कि बैंकों में ऋण देने के लिए मारामारी रहती है।

एक तरफ तो आई-जेनरेशन अपनी खुशियों को खरीदने के लिए ऋषि चार्वाक की परिपाटी पर 'जब तक जिओ, सुख से जिओ-कर्जा लेकर घी पियो' का सिद्धांत अपना चुकी है, वहीं पुरानी पीढ़ी को लगता है कि ऋण की यह प्रवृत्ति उनके बच्चों के भविष्य के लिए घातक हो सकती है। इसका जीवंत उदाहरण है देहरादून निवासी सेवानिवृत्त शिक्षिका पार्वती प्रसाद और उनके बेटे-बहू के बीच इन दिनों चल रहा शीतयुद्ध। पार्वती कहती हैं, ''उनके पास तीन साल पुरानी छोटी कार है और अब वे इसको औने-पौने बेच कर इस धनतेरस पर किश्तों में नई लग्जरी कार खरीदने जा रहे हैं। यह और कुछ नहीं, अमीरी का शौक लगा है।'' वहीं उनके कामकाजी बेटे-बहू का तर्क है कि बुढ़ापे तक पाई-पाई जोड़ कर सेवानिवृत्ति के बाद हरिद्वार घूमने से अच्छा है कि जिंदगी को आज जी लिया जाए!


पीढि़यों के बीच यह टकराव सामान्य सी बात है, लेकिन यह भी सच है कि किश्तों पर खुशियाँ खरीदने का तरीका कभी-कभी इतना महँगा पड़ जाता है कि मानसिक और पारिवारिक शांति जैसी कीमत चुकानी पड़ जाती है। चंडीगढ़ स्थित फाइनेंशियल एनालिस्ट सुमन गोखले कहती हैं, ''ग्लोबल मंदी के दौर में भी अगर देश में कोई बड़ी समस्या नहीं आई, तो इसकी वजह थी भारतीयों को विरासत में मिला बचत करने और कर्ज से दूर रहने का संस्कार। इसके विपरीत किश्तों पर जीने वाला अमेरिकी समाज आज मुसीबतों में घिरा हुआ है। यकीनन इतने बड़े उदाहरण से तो ऐसा ही लगता है कि पैर फैलाने के लिए चादर उधार माँगने से पहले पूरा गुणा-भाग कर लेना जरूरी है, वरना शान तो क्या बढे़गी, शांति भी नहीं बचेगी!''
 

[दिखावा बढ़ा समाज में]

आज जमीन-जायदाद और जेवर ही नहीं, जीन्स और टूर पैकेज तक कर्ज और आसान किश्तों पर उपलब्ध हैं। इनके संभावित ग्राहक हैं युवा और मध्य आयु वर्ग के ऐसे एग्जीक्यूटिव, जिनके पास ऋण लेने और किश्तों को चुकाने की क्षमता है। कुछ दिन पहले  एक केस आया था, एक व्यक्ति ने पत्नी की जिद की वजह से कर्ज लेकर हैसियत से बड़ी गाड़ी खरीद ली। बाद में किश्तें अदा करने में पसीने छूटने लगे तो उन्होंने गाड़ी बेचने का फैसला लिया।  देखा जाये तो यह दिखावा ही नहीं, एक बीमार मानसिकता है। इसकी वजह से घरों में तनाव होता है और बच्चे भी प्रभावित होते हैं।


[बढ़ा है लाइफस्टाइल प्रेशर]

इस तेज रफ्तार जिंदगी में इंसान सब कुछ पा लेना चाहता है, जबकि उसे यह मालूम नहीं होता कि उसे किस चीज की जरूरत है और किसकी नहीं। लोग अपनी जिंदगी से कम और दूसरों की समृद्धि से ज्यादा दुखी होने लगे हैं। यही लाइफस्टाइल प्रेशर होता है |
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लोग लाइफस्टाइल को लेकर जरूरत से ज्यादा कॉन्शस हो गए हैं। रोज़ कई लोग मिलते रहते हैं, जो लाइफस्टाइल को लेकर डिप्रेशन के शिकार होते हैं। हालांकि वे मानने को तैयार नहीं होते, लेकिन जब उनसे बात करी जाये, तब चीजें खुलकर सामने आती हैं। वे यह नहीं जानते कि किश्तों में खुशियां नहीं खरीदी जा सकतीं, खुशियां तो हमारे मन के भीतर से आती हैं।
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हम तो अब भी यही कहेगे कि 'अपनी चादर देख कर पाँव पसारने' की कहावत आज भी एकदम सटीक है आगे जो 'आई-जेनरेशन' की मर्ज़ी| 

वैसे भी अब तो सब जान ही गए है, अपनी आदत है सो कहेते है .........जागो सोने वालो .........

शनिवार, 3 अक्तूबर 2009

बधाई हो जी बहुत बहुत बधाई – बोफोर्स केस बंद करने की अर्जी सीबीआई ने लगाई

Posted by at 1:41 pm

बोफोर्स दलाली कांड को बंद करने के लिए सीबीआई ने शनिवार को दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट में अर्जी दायर की। जांच एजेंसी ने मामले के मुख्य आरोपी इटली के व्यापारी ओतावियो क्वात्रोची के खिलाफ सबूत न होने और उसे प्रत्यर्पित करने की सभी कोशिशें नाकाम रहने के बाद यह फैसला किया।
सीबीआई ने अपनी अर्जी में अदालत से अपील की कि अधिवक्ता अजय अग्रवाल की बातों को नहीं सुना जाना चाहिए क्योंकि उनका इस मामले में कोई अधिकार क्षेत्र नहीं बनता है। सुप्रीम कोर्ट में बोफोर्स मामले की पैरवी कर रहे अग्रवाल ने अदालत से सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को नहीं मानने की अपील करते हुए कहा था कि सरकार क्वात्रोची को बचने का मौका दे रही है।

उल्लेखनीय है कि दो दशक पुराने इस मामले में एकमात्र जीवित आरोपी क्वात्रोची देश में किसी भी अदालत में आज तक पेशी के लिए नहीं आया। दिल्ली हाईकोर्ट ने 31 मई 2005 को अन्य आरोपियों के खिलाफ आरोपों को खारिज कर दिया था।
इससे पहले केंद्रीय विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने गुरुवार को लंदन में कहा था कि सीबीआई क्वात्रोची के खिलाफ मुकदमा वापस ले लेगी।
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बस साहब, खेल ख़त्म !! २० साल चला यह खेला और कितना चलता ??
मान भी लो, कभी ना कभी तो ख़त्म होना ही था तो भैया आज क्यों नहीं ?? जो भी होता है भले के लिए ही होता है, अब किस के भले के लिए यह तो निर्भर करता है अपनी अपनी सोच पर, इस बारे में हम कुछ नहीं कहेगे ! हमारी तरफ से सब को बहुत बहुत बधाई इस केस के बंद होने की !
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हम तो बस इतना कहेगे कि अब तो ....... जागो सोने वालो .............

राहुल की राजनीतिक संवेदना

Posted by at 11:28 am
इस महीने राहुल गांधी ने गोपनीय रूप से उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले के एक गांव में खाना खाया, रात को वहीं ठहरे और वापस दिल्ली चले आए। उत्तर प्रदेश में उनकी ऐसी कई यात्राएं हो चुकी हैं जो उत्तर प्रदेश सरकार को चिढ़ाने के उद्देश्य से ही होती हैं। गरीबों की सेवा राजनीतिक अभिनय नहीं, संवेदनाजन्य मन की पीड़ा है। इसकी अभिव्यक्ति तो महात्मा गांधी ने चंपारण में 1918 में की थी। उन्हे भी क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बिहार की गरीबी के दर्शन के लिए आमंत्रित किया था। वहां की हिला देने वाली गरीबी के अनुभव के बाद उन्हें शोषण और लूट के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा मिली। उन्होंने चंपारन में ही पहला सत्याग्रह किया। गरीबी उन्मूलन व अन्याय के विरुद्ध कारगर संघर्ष के लिए अड़ने और टिकने की आदत बनानी होगी। कांग्रेसजन कहते है कि राहुल गांधी भारत की गरीबी का साक्षात दर्शन करना चाहते है।
गांधीजी से लेकर राष्ट्रीय आंदोलन के सभी नेताओं ने गरीबी देखी ही नहीं थी, उसे भोगा भी था। आजाद भारत में गरीबी अध्ययन के अनेक कमीशन बने। योजना आयोग तो 1952 से गरीबी का ही अध्ययन कर रहा है। भारत की गरीबी, गांवों की उपेक्षा, सड़क, बिजली का अभाव क्या इसे अभी जानना शेष है? जो जानना है वह यह कि इसकी समाप्ति के लिए क्या किया जा रहा है? जिनके हाथ में सत्ता है वे कुछ ठोस उपाय करने की जगह इसे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को चिढ़ाने का मुद्दा बनाएं, इसे उचित नहीं कहा जा सकता। भारत सरकार ने भीषण सूखे से जूझ रहे देश को धन जुटाने का सबसे सबल रास्ता सादगी बताया। उस पर अमल शुरू हुआ कि कांग्रेस के सभी सांसद अपने वेतन का 20 फीसदी सूखा राहत कोष में दें। उनके मंत्री और सांसद को पंचसितारा होटल की ठंडी हवा से बाहर किया गया। मितव्ययिता का श्रेय लूटने की होड़ में सत्ताधारी दल ने यह प्रदर्शन किया। यह हास्यास्पद है, क्योंकि सांसदों के ऊपर होने वाले खर्चे में वेतन तो नाममात्र है। राहुल गांधी साधारण श्रेणी में गए, लेकिन उनके सुरक्षा प्रहरी बुलेट प्रूफ गाड़ियों का काफिला लेकर विशेष विमान से उनके आगमन के पूर्व लखनऊ में विराजमान थे। अपने वेतन का 3200 रुपये दान कर देना और डेढ़ सौ करोड़ की विश्व की सर्वाधिक खर्चीली सुरक्षा घेरे में चलना पाखंड नहीं तो क्या है? विदेश राज्य मंत्री ने साधारण श्रेणी को पशुओं की श्रेणी करार दिया तो उन्हे फटकार मिली, लेकिन उसी दिन प्रधानमंत्री ने विशेष विमान में सैकड़ों सहयोगियों, रक्षा कर्मियों के साथ अमेरिका की यात्रा शुरू कर दी। वित्त मंत्री के सादगी मंत्र का इससे बड़ा उपहास क्या होगा? गांधीजी का नाम लेकर सादगी का मंत्र जाप आसान है, लेकिन उसका अनुकरण कठिन है।


मेरे अनुमान से जब राहुल गांधी ने ग्राम प्रधान की पूड़ी-सब्जी खाई, उनके घर में रात गुजारी और वहीं स्नान किया तो उन्हे दिल के किसी कोने में यह बात जरूर कचोट रही होगी कि जिस गरीब देश को चलाने की जिम्मेदारी मुझे लेनी पड़ सकती है उस देश के राजपुरुषों और राजकुमारों पर डेढ़ सौ करोड़ की खर्चीली सुरक्षा क्या तार्किक है? यदि अहम प्रश्न ने उन्हे परेशान नहीं किया तो विश्वास किया जा सकता है कि उनका दलित और गरीब प्रेम रणनीतिक है, हृदय के अंत:स्थल से उपजी संवेदना का हिस्सा नहीं। गांवों में टिकने, ग्रामीणों से घुलमिल जाने का अभिनय उत्तर प्रदेश के कई मुख्यमंत्रियों ने अपने अधिकारियों के अमले के साथ कई बार किया है। जार्ज फनरंडीज ने तो उद्योग मंत्री की हैसियत से अपनी सभी सरकारी बैठकें दूरस्थ ग्रामीण अंचलों में की हैं, लेकिन बैठक समाप्त होते ही नेता और अफसर गांव की पीड़ा गांव में छोड़कर राजधानी के लिए उड़ जाते थे।
राष्ट्रीय आंदोलन के शाश्वत मूल्यों को कांग्रेस की स्वातंत्रयोत्तर पीढ़ी ने इतना बदरंग किया कि वे निष्प्रभावी हो गए। स्वदेशी, सादगी सांकेतिक विषय हो गए। राजकर्ताओं के मुंह से सादगी का मंत्र मजाक का विषय बन गया है। 1971 की महान विजय के बाद इंदिरा गांधी के कार्यकाल में पेट्रोल के दाम पांच गुना बढ़े थे। देश के लोग कार का उपयोग न्यूनतम करें, इसके लिए वह एक दिन बैलगाड़ी में बैठकर संसद भवन पहुंचीं और दूसरे ही दिन से गाड़ियों का काफिला उनके साथ आने लगा। मोरारजी देसाई अपने निवास से संसद भवन पैदल आने लगे और इस सिलसिले को लगातार पांच वर्ष तक जारी रखा। भारत के तत्कालीन गृहमंत्री इंद्रजीत गुप्त वेस्टर्न कोर्ट के दो कमरे के फ्लैट से ही गृह मंत्रालय का कामकाज निपटाते रहे। जवाहर लाल नेहरू ने अवध के ताल्लुकेदारों के खिलाफ किसानों, गरीबों का आंदोलन खड़ा किया था। वह अवध की गरीबी का कारण ताल्लुकेदारों की लूटखसोट की प्रवृत्ति को मानते थे, किंतु उनके उत्तराधिकारियों ने अवध में कांग्रेस का नेतृत्व ताल्लुकेदारों के हाथ में थमा दिया। जब कभी बाढ़, सूखा के दर्शन करने हुए तो इंदिरा गांधी से लेकर सोनिया तक सभी को नींद इन्हीं ताल्लुकेदारों के राजप्रसाद में आती थी।
कुछ लोग खुश हो सकते हैं कि राहुल गांधी ने दलित, उपेक्षित के अहाते में शयन का अभ्यास शुरू किया है। इस तरह का अभ्यास वीपी सिंह ने 1990 में अमेठी के गांवों में शुरू किया था। गरीब की खाट पर सोना, कुएं में से पानी निकालकर स्नान करना, उनसे मांगकर खाना खाना आदि सब किया, लेकिन उन्होंने उनका भाग्य बदलने का सार्थक प्रयास नहीं किया। क्या राहुल गांधी का गांवों में रात्रि प्रवास सत्ता संतुलन बदलने का कोई कारगर प्रयास है? क्या दो-चार गरीब, दलित परिवारों को अपने प्रभाव के प्रयास से कुछ धन दान दिलाकर गरीबी उन्मूलन हो जाएगा अथवा व्यवस्था बदलकर उत्पादन के साधनों की मिल्कियत इन गरीब हाथों में देकर इन्हे सक्षम बनाना होगा? क्या अवध के राजपुत्र राहुल गांधी को कुछ करने देंगे, क्योंकि अवध के सभी राजघराने कांग्रेस में है और राहुल के मित्र हैं।

- मोहन सिंह [लेखक सपा के पूर्व सांसद हैं]
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आम जनता अब यह बखूब समझती है कि कौन उनका सच्चा हितेषी है इस लिए सभी राजनेताओ को चाहिए कि अपने अपने राजनीतिक नाटक बंद करे और अगर सच में आम जनता के लिए कुछ करना चाहते है तो वह करे ! नहीं तो एक दिन वो आएगा जब जनता ही नेताजी की खटिया बिछाने के बजाये खड़ी कर देगी !
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इतना समझाने के बाद भी अगर आप ना सुधारना चाहो तो आप की मर्ज़ी .....
अपनी तो आदत है इस लिए कहते है ...........जागो सोने वालो .......

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009

भरोसे पर आघात - क्वात्रोची को चरणबद्ध तरीके से राहत प्रदान करने की एक सुनियोजित रणनीति पर अमल

Posted by at 3:30 pm
यह राष्ट्रीय चेतना और भरोसे पर किया जाने आघात है कि बीस वर्षो की जांच-पड़ताल और इस दौरान सामने आए तमाम पुष्ट एवं परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के बावजूद बोफोर्स तोप सौदे की दलाली के मामले में यह कहा जा रहा है कि मुख्य अभियुक्त ओतावियो क्वात्रोची के खिलाफ दायर मुकदमे को वापस लेने के अलावा अन्य कोई उपाय नहीं। यदि इस मामले में कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्रीय सत्ता को यही सब करना था तो उसने पिछले लगभग छह वर्षो में देश का समय और धन क्यों बर्बाद होने दिया? केंद्रीय सत्ता चाहे जो तर्क दे, यह मानने के अच्छे भले कारण हैं कि उसने क्वात्रोची को चरणबद्ध तरीके से राहत प्रदान करने की एक सुनियोजित रणनीति पर अमल किया ताकि कहीं कोई बड़ा हंगामा न खड़ा हो। आखिर कौन नहीं जानता कि पहले क्वात्रोची के लंदन स्थित बैंक खातों से बड़ी ही बेशर्मी के साथ गुपचुप रूप से पाबंदी हटाई गई और जब इसका भेद उजागर हुआ तो कई दिनों तक कोई भी यह बताने वाला नहीं था कि यह पाबंदी किसके आदेश पर हटाई गई? इसके बाद क्वात्रोची के खिलाफ जारी रेड कार्नर नोटिस वापस ले लिया गया। स्पष्ट है कि इतना सब करने के बाद वह कहा ही जाना था जो विगत दिवस सालिसिटर जनरल के माध्यम से उच्चतम न्यायालय के समक्ष बयान किया गया। आश्चर्य नहीं कि कुछ समय के बाद क्वात्रोची को भारत आकर व्यापार करने की छूट प्रदान कर दी जाए।
नि:संदेह आम जनता की याददाश्त कमजोर होती है, लेकिन प्रत्येक मामले में नहीं। वह इस तथ्य को आसानी से नहीं भूल सकती कि बोफोर्स तोप सौदे में न केवल दलाली के लेन-देन की पुष्टि हुई थी, बल्कि इसके सबूत भी मिले थे कि दलाली की रकम किन बैंक खातों में जमा हुई। इस पर भी गौर किया जाना चाहिए कि इस सब की पुष्टि उसी सीबीआई की ओर से की गई जो आज सबूत न होने का राग अलाप रही है। इसका सीधा मतलब है कि सरकार बदलने के साथ ही सीबीआई के सबूतों की रंगत भी बदल जाती है। जो जांच एजेंसी इस तरह से काम करती है वह शीर्ष तो हो सकती है, लेकिन स्वायत्त और भरोसेमंद कदापि नहीं। क्या केंद्रीय सत्ता अब भी यह कहने का साहस करेगी कि वह सीबीआई के काम में दखल नहीं देती? लोक लाज की परवाह न करने वाली सरकारें कुछ भी कह सकती हैं, लेकिन सीबीआई को स्वायत्त बताने से बड़ा और कोई मजाक नहीं हो सकता। बोफोर्स दलाली प्रकरण की जांच के नाम पर जो कुछ हुआ उससे यह साफ हो गया कि इस देश में उच्च पदस्थ एवं प्रभावशाली व्यक्तियों के भ्रष्टाचार की जांच नहीं हो सकती। यह किसी घोटाले से कम नहीं कि भ्रष्टाचार के एक मामले की जांच में भ्रष्ट आचरण का ही परिचय दिया गया। सीबीआई ने इस मामले की जांच में जो करोड़ों रुपये खर्च किए उन्हें वस्तुत: दलाली की रकम में ही जोड़ दिया जाना चाहिए। क्या कोई यह स्पष्ट करेगा कि सीबीआई के मौजूदा अधिकारी झूठ बोल रहे हैं या पूर्व अधिकारी ऐसा कर रहे हैं? नि:संदेह दोनों ही सही नहीं हो सकते। हो सकता है कि बोफोर्स प्रकरण का शर्मनाक तरीके से यह जो पटाक्षेप हुआ वह राजनीतिक हानि-लाभ में तब्दील न हो, लेकिन यह मामला सदैव इसकी याद दिलाता रहेगा कि हमारे देश में जांच को आंच दिखाने का काम कैसे किया जाता है?
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सोनिया आंटी के अंकल क्वात्रोची को भला हम कैसे धर सकते है ?? आंटी के माननीय मतलब हमारे भी माननीय ....है के नहीं ?? 
और फ़िर क्या फर्क पड़ता है .........इतने साल बीत गए ........एसे ही और भी साल बीत जायेगे.......TAKE A CHILL PILL BABY .......!!!
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ना हम कुछ भूले है................. ना भूलेगे.......हर बार कि तरह .......इस बार भी सिर्फ़ इतना कहेगे ............जागो सोने वालो .................

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