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बुधवार, 3 फ़रवरी 2021

डिजिटल मार्केटिंग के दौर में होता किसान आंदोलन

ये डिजिटल मार्केटिंग का दौर है, साहब। आप इसे जितनी जल्द समझ जाएं उतना अच्छा।

सोशल मीडिया के इस दौर में आप के मोबाइल तक किसी भी उत्पाद या एजेंडे को पहुँचाने का एक प्रभावी साधन है ये डिजिटल मार्केटिंग। कंपनियां और संस्थाएं इसका भरपूर उपयोग कर रही है पिछले कुछ वर्षों से। और सब से कमाल बात यह है कि हम और आप ही इस में इन लोगों की सहायता कर रहे हैं। कैसे यह आगे बताता हूँ ।

कुछ नामचीन हस्तियों द्वारा किसी भी उत्पाद या मुद्दे पर एक साथ, एक जैसे पोस्ट करते देखें तो समझ जाइये कि विज्ञापन का यही खेल चालू है। फेसबुक और इंस्टाग्राम पर हम खुद नामचीन हस्तियों की देखा देखी चेक इन विकल्प के माध्यम से बताते हैं कि हम किस जगह मौजूद हैं या फ़िलहाल किस उत्पाद का उपयोग कर रहे हैं। जबकि इस के एवज में हमें कोई आर्थिक लाभ नहीं होता पर हम फ़िर भी ये करते हैं क्यूँ की यही मौजूदा ट्रेंड बन गया है ।

आप खुद सोचिए अगर कोई आपको किसी विशेष उत्पाद या मुद्दे के समर्थन में एक दो ट्वीट या फेसबुक या इंस्टाग्राम पोस्ट लगाने के बदले एक अच्छी खासी रकम की पेशकश करे तो क्या आप उसे छोड़ देंगे। ऐसे मामले में विचारधारा की न सोच अक्सर इस से होने वाले आर्थिक लाभ को अधिक महत्व दिया जाता है। कुछ वर्षों पूर्व आए स्टिंग ऑपरेशन में इसी प्रकार के खुलासे भी हुए थे कि चुनावों को प्रभावित करने के उद्देश्य से किसी प्रकार राजनीतिक दलों द्वारा देश की नामचीन हस्तियों को धनलाभ देते हुए सोशल मीडिया पर ऐसे ही प्रचार करवाया गया था।


किसान आंदोलन के समर्थन में चंद विदेशी हस्तियों के ट्वीट कल से सुर्खियों में आये हैं, पर सभी ट्वीटों की शैली कमोबेश एक सी ही है। आश्चर्य नहीं होगा यदि ये सब भी एक सोची समझी डिजिटल मार्केटिंग नीति के तहत किया गया हो। क्यों कि जिन हस्तियों के ट्वीट आए हैं उनको भारत के बारे में कितनी जानकारी है यह संदेह के घेरे में है, उस पर भारतीय किसानों की समस्यों की जानकारी होना तो बिलकुल ही असंभव सी बात लगती है । फिर यह सवाल भी खड़ा होता है कि सरकार और किसानों के बीच किस कारण गतिरोध बना हुआ है उन कृषि बिलों के विषय में इन लोगों को कितनी जानकारी है और यह जानकारी इनको कहाँ से मिली है !? 

इन सब कारणों से ही इन विदेशी हस्तियों द्वारा भारत के आंतरिक मामलों में अपनी राय देना कोई जनहित में की गई मुहिम से ज्यादा एक सोची समझी राजनीतिक साजिश लग रही है। जिस में सोशल मीडिया के डिजिटल मार्केटिंग वाले हथियार कर जम कर उपयोग किया जा रहा है ।

मौजूदा किसान आंदोलन के समर्थन में जिन विदेशी हस्तियों के ट्वीट आये हैं उन से वास्तविक किसानों को कोई बल मिला हो या न मिला हो पर इस आंदोलन की आड़ में समान्तर रूप से चल रहे भारत विरोधी एजेंडे को अवश्य बल मिला है।

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वास्तविक किसानों के वास्तविक हितों का हर भारतीय को पक्ष लेना चाहिए। साथ साथ ये भी देखना चाहिए कि किसानों के कंधों पर बंदूक रख कोई अपना उल्लू न सीधा कर ले। जैसा कि होता दिख रहा है। 

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जागो सोने वालों ...

गुरुवार, 3 दिसंबर 2020

भोपाल गैस कांड की ३६ वीं बरसी



भारत के मध्य प्रदेश राज्य के भोपाल शहर मे 3 दिसम्बर सन् 1984 को एक भयानक औद्योगिक दुर्घटना हुई। इसे भोपाल गैस कांड, या भोपाल गैस त्रासदी के नाम से जाना जाता है। भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड नामक कंपनी के कारखाने से एक ज़हरीली गैस का रिसाव हुआ जिससे लगभग 15000 से अधिक लोगो की जान गई तथा बहुत सारे लोग अनेक तरह की शारीरिक अपंगता से लेकर अंधेपन के भी शिकार हुए। 

 

भोपाल गैस काण्ड में मिथाइलआइसोसाइनाइट (मिक) नामक जहरीली गैस का रिसाव हुआ था। जिसका उपयोग कीटनाशक बनाने के लिए किया जाता था। मरने वालों के अनुमान पर विभिन्न स्त्रोतों की अपनी-अपनी राय होने से इसमें भिन्नता मिलती है। फिर भी पहले अधिकारिक तौर पर मरने वालों की संख्या 2,259 थी। 
 

मध्यप्रदेश की तत्कालीन सरकार ने 3,787 की गैस से मरने वालों के रुप में पुष्टि की थी। अन्य अनुमान बताते हैं कि ८००० लोगों की मौत तो दो सप्ताहों के अंदर हो गई थी और लगभग अन्य 8000 लोग तो रिसी हुई गैस से फैली संबंधित बीमारियों से मारे गये थे। 
 
२००६ में सरकार द्वारा दाखिल एक शपथ पत्र में माना गया था कि रिसाव से करीब 558,125सीधे तौर पर प्रभावित हुए और आंशिक तौर पर प्रभावित होने की संख्या लगभग 38,478 थी। ३९०० तो बुरी तरह प्रभावित हुए एवं पूरी तरह अपंगता के शिकार हो गये।

भोपाल गैस त्रासदी को लगातार मानवीय समुदाय और उसके पर्यावास को सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाली औद्योगिक दुर्घटनाओं में गिना जाता रहा। इसीलिए 1993 में भोपाल की इस त्रासदी पर बनाए गये भोपाल-अंतर्राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग को इस त्रासदी के पर्यावरण और मानव समुदाय पर होने वाले दीर्घकालिक प्रभावों को जानने का काम सौंपा गया था।
 

आज इस त्रासदी की 36 वीं बरसी है। इतिहास साक्षी है कि किस प्रकार तब की कांग्रेस सरकार ने इस त्रासदी के सब से बड़े दोषी वॉरेन एंडरसन को सभी कानूनों को ताक पर रख बच निकल जाने का पूरा मौका दिया और पीड़ितों को न्याय से वंचित रखा।
 

 इतने वर्षो के बाद भी आज तक इस त्रासदी के पीड़ितों के साथ न्याय नहीं हुआ है ... सरकारें आती जाती रहती हैं और ये सभी न्याय के तरसते रह जाते हैं | इस त्रासदी में मारे गए लोगों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि सरकार जल्द से जल्द बचे हुए पीड़ितों और उन के परिवार की सुध ले और उनकी शिकायतों का निस्तारण करें |

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जागो सोने वालों ...

रविवार, 29 नवंबर 2020

बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी ...

काँग्रेसी
मित्रों को सादर आभार जिन्होंने, आज भी गोडसे को उतना ही प्रासंगिक बना रखा है।

इसी बहाने वे गोडसे और उनकी विचारधारा के बारे में आज के युवाओं के मन में प्रश्न तो निश्चित ही खड़े कर रहे हैं।
 
बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी ... आज के इंटरनेट युग का विचारशील युवा आप से ये जरूर पूछेगा या स्वयं गूगल पर जरूर खोजेगा कि ऐसे क्या कारण थे कि १९४८ में एक युवा द्वारा उस व्यक्ति की हत्या की गई जिसे कि देश की स्वतंत्रता प्राप्ति का प्रमुख कारण बताया जाता था।
 
क्या बताओगे उसको !!?? आप तो इस विषय पर चर्चा तक नहीं करना चाहते हो न किसी को करने देते हो !!
 
गांधी कितने बड़े महात्मा थे और गोडसे कितने बड़े पापी ये तय करने के लिए भी चर्चा तो करनी ही होगी और यही तो आजतक हुआ नहीं कि इन मुद्दों पर खुली बहस या चर्चा हुई हो।
 
यही तो हम चाहते है कि आप चर्चा तो करो।
 
😉 
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भई, कम से कम पता तो चले कि जिस व्यक्ति को किसी भी पाठ्यक्रम में स्थान नहीं मिला, जिसके नाम पर कोई पुरस्कार, चौराहा, मोहल्ला, इमारत नहीं उसके बारे में चर्चा क्यों होती है? क्यों बहुत से लोग उसे पसंद करते हैं? क्या कारण है जो सोशल मीडिया और मैन स्ट्रीम मीडिया में उसे हर बार जगह मिलती है!!?? इस बारे में सोचो और जानो !!
 
किसी को भी महान या शैतान बनाने से पहले उस के बारे में जान तो लो ... किसी भी विचारधारा का अंध अनुसरण और अंध विरोध दोनों ही समाज के लिए घातक है |
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जागो सोने वालों ...  

बुधवार, 22 मई 2019

सभी नेता जानते हैं - EVM कभी हैक नहीं हो सकता

EVM कभी हैक नहीं हो सकता, ये बात सबसे ज़्यादा बेहतर ख़ुद राजनीतिक पार्टियाँ और ... ये नेता भी जानते हैं। EVM से चुनाव की प्रक्रिया एकदम फ़ुल प्रूफ़ है, इसमें हैकिंग या इन्हें बदले जाने की सम्भावना पूरी तरह से नगण्य है। सबसे पहले चुनाव की प्रक्रिया शुरू होती है मतदान दल को चुनाव सामग्री के अलॉट्मेंट से, चुनाव सामग्री यानि EVM उसकी कंट्रोल यूनिट और अन्य रेजिस्टर एवं चेक लिस्ट... हर EVM की एक यूनीक आईडी होती है, जो EVM में इलेक्ट्रानिक्ली और मतदान दल को मैन्यूअली बताई जाती है।

मतदान वाले दिन सुबह मतदान शुरू होने के 75 मिनिट पहले एक मॉक पोल कंडक्ट कराना ज़रूरी होता है,
और उस मॉक पोल में राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधि की उपस्थिति भी ज़रूरी होती है, ख़ुद राजनैतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों के सामने मॉक पोल में हर उम्मीदवार को बराबर बराबर संख्या में वोट दिए जाते हैं, जिनकी गिनती उन्हें उनके सामने मशीन से करके दिखाई जाती है। फिर मशीन का डेटा क्लीयर करके उसे 0 पर सेट किया जाता है, जिसके बाद मशीन को सील कर दिया जाता है, जिस स्ट्रिप से मशीन को सील किया जाता है ... उसके ऊपर राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ता या प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर अनिवार्य रूप से लिए जाते हैं, जिन्हें वो काउंटिंग के समय वो मैच करा सकते हैं।

इस बीच अगर मशीन को खोला जाए तो वो स्ट्रिप फट जाएगी, उस स्ट्रिप को इस तरह से चिपकाया जाता है कि उसे खोलना सम्भव ही नहीं है। चिपकाने के बाद उस पर लाख से चपरा लगाकर पेक किया जाता है।
अब तो VVPAT भी आ गया है, आप ख़ुद चेक कर सकते हैं कि आपने किसको वोट दिया, और आपका वोट उसी को गया या नहीं ...चुनाव आयोग ने रैंडम्ली हर विधानसभा से 5 बूथों की VVPAT की गिनती का प्रावधान रखा है, धाँधली तो ख़ैर हो ही नहीं सकती लेकिन क्रॉस चेकिंग एकदम प्रॉपर हो जाएगी इससे।

चुनाव सम्पन्न होने के बाद EVM को स्ट्रोंग रूम में रखा जाता है जिसके बाहर पुलिस के अलावा सशस्त्र बलों की निगरानी होती है, वहाँ पूरे समय CCTV कैमरा रिकॉर्डिंग होती है और ख़ुद राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को भी उस पर निगरानी रखने की पर्मिशन होती है।

एहतियातन प्रशासन ने अधिकांश जवानों पर स्ट्रॉंग रूम को सिर्फ़ गेट या दरवाज़े से बंद नहीं किया, बल्कि एक पूरी काँक्रीट की दीवार खड़ी करवा दी है जिसे उसी दिन सुबह तोड़ कर खोला जाएगा।अब ऐसे में ये जो भी लोग EVM की हैकिंग या उसे बदले जाने का हल्ला मचा रहे हैं उन्हें उनकी हार निश्चित दिख रही है, इन पर अफ़वाह फैलाने और देश में जान बूझकर अराजकता फैलाने के आरोप में क़ानूनी कार्यवाही होनी चाहिए।

याद रखिए, ये पूरी चुनावी प्रक्रिया एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें देश भर में कम से कम पचास लाख या उससे भी ज़्यादा सरकारी कर्मचारी दिन रात लगातार कई दिनों तक एकदम ईमानदारी से अपनी ड्यूटी निभाते हैं,
कितने लोग कितने दिन तक खाना नहीं खाते, सिर्फ़ चाय समोसे पर बिना नहाए धोए अनवरत काम करते हैं तब जाकर ये चुनाव सम्पन्न होते हैं, और ये नेता अपनी हार की बेज्जती से बचने के लिए सबको बेईमान बता देते हैं।
EVM से होने वाले चुनाव इस देश 135 करोड़ लोगों और इस देश के लोकतंत्र की सफलता हैं, हमें इस प्रक्रिया पर गर्व होना चाहिए|


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विश्व के सब से बड़े लोकतंत्र के नागरिक के तौर मुझे गर्व है अपने देश के लोकतांत्रिक मूल्यों पर और पूर्ण विश्वास है अपने संवैधानिक संस्थानों पर और उनकी कार्यप्रणाली पर | ऐसे में जब मात्र सत्ता लोभ में बिना किसी ठोस प्रमाण के राजनीतिक दलों को इन पर प्रश्न उठाते देखता हूँ तो कष्ट होता है | राजनीति कीजिए पर ऐसी राजनीति न कीजिए जो देशहित में न हो |

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जागो सोने वालों ...

शनिवार, 13 अप्रैल 2019

राजनीति के शौकीन हैं तो राजनीति कीजिए खुल कर ...

"राजनीति का सीधा सरल अर्थ था, प्रजा के हित में राज्य को चलाने की वह नीति, जो साम दाम दंड भेद के साथ वह करे, जो राज्य को, देश को सुदृढ बनाये । पर इतिहास हो या वर्तमान राजनीति हो गई मात्र एक कुर्सी, जिस पर बैठकर पंच परमेश्वर जैसी बात को पैरों के नीचे रौंदकर अट्टाहास करनेवाला श्रेष्ठ हो गया । कमाल की बात ये कि प्रजा भी उसके साथ लूटमार में रम गई और खून खराबे के साथ अपना विकास करने लगी ! 
सत्य की जीत आज भी होती है, लेकिन रक्तबीजों के रक्त में नहाकर ।
 
वंश, परम्परा के अनुसार किसी गलत हाथ में शासन की बागडोर देना सही नहीं था, आज भी नहीं । 
रावण के कृत्य ने विभीषण को धक्के देकर निकाल दिया, तब हमने आपने ही कहा "घर का भेदी लंका ढाहे" । क्या लंका का नाश ज़रूरी नहीं था ? याद कीजिये, कुम्भकरण ने भी पहले यही कहा, "घोर अनर्थ, साक्षात दुर्गा को बंदी बना लिया..." । रावण द्वारा मारे जाने से बेहतर उसने राम की सेना के हाथों मरना उचित समझा, तो हमने आपने कहा, उसने भाई का कर्तव्य निभाया .... भाई रावण के गलत कार्यों के आगे रावण दहन का उत्सव मनाते हुए सब रावण हो गए । तो यह तो तय ही है न कि राम का विरोध होगा ही न ।! 
 
राम ने पत्नी को क्यों त्याग दिया, ... यह व्यक्तिगत सवाल करते हुए कभी आपने सोचा है कि आप अपनी पत्नी के साथ क्या करते हैं ! रावण की निंदा करते हुए याद आती है निर्भया, दामिनी, अरुणा शानबाग जैसी गुमनाम हो गई स्त्रियाँ ?
 
 
बंधु, तुमने तो उसे नायक मान लिया, जिसने घृणित कुत्सित कार्य किये । गीत लिखते हुए, तुमने सारे सुर बिगाड़ दिए एक ग़लत राग को पकड़कर । तुम्हें विभीषण माना जाए या कुम्भकरण ?
 
...विभीषण तुम हो नहीं सकते, कुम्भकरण जैसा सत्य कहने का साहस भी नहीं तुममें । तो क्या कहा जाए तुम्हें, जो तुमने कन्हैया को नायक मान लिया । कहाँ गई संवेदना ? सत्य के विरोध में बन गए रक्तबीज !!
खैर, कन्हैया खड़े हो रहे है बेगूसराय से, तो वहाँ की जनता क्या सोचती है यह मायने रखेगा, हार गए तो सारी कविताएँ धरी की धरी रह जाएंगी, यदि कुचालों से जीत गए तब भी देशद्रोही ही कहे जाएंगे, और जनता तब अपना सर पिटेगी ।"
 
( एक ब्लॉगर मित्र की यह वो टिप्पणी है जो ब्लॉग पोस्ट पर की जानी थी पर नहीं की गई क्यूँकि ब्लॉग पर कमेन्ट मोडरेशन लगाया हुआ है, सो मुझे भेजी गई | )
 
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खुद को बुद्धिजीवी कहलवाने के शौक़ में किस हद तक गिरोगे आप ... यही विचारधारा है आपकी जो किसी ऐसे व्यक्ति का समर्थन करने को आप को प्रेरित करती है जो भारत के टुकड़े करना चाहता हो, भारत को बर्बाद होते देखना चाहता हो, जो हमारे वीर सैनिकों को बलात्कारी कहता हो, जो भारत के शत्रुओं का हितैषी हो | एक बार को भी हाथ न काँपे ऐसे व्यक्ति का महिमामंडन करते हुए !? उस पर तुर्रा ये कि कविता में आप खुद लिखते हैं ...
भारत मां घायल है ,इन गद्दारों  से , 
जनमन लेके साथ,कन्हैया जीतेगा !
 
गद्दारी की और कौन सी नई परिभाषा गड़ी है आप ने ... जो हम ने पढ़ी उस हिसाब से तो आपकी कविता के नायक बिलकुल सटीकता से गद्दार कहे जा सकते हैं | और बताता चलूँ ऐसी हज़ार कविताएं भी उस के किए को मिटा नहीं सकती | भारत के टुकड़े करने की बात करने वाला जननायक नहीं कहला सकता वो सर्वदा राष्ट्रद्रोही ही कहलाएगा |

और यदि यही आपकी भी सोच है तो क्यूँ न आप को भी हम वही कहें जो हम उसे कहते हैं - गद्दार या देशद्रोही |

राजनीति के शौकीन हैं तो राजनीति कीजिए खुल कर ... विरोध करना है कीजिए खुल कर ... मुद्दे उठाइए , बहस कीजिए ... लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत जो जो प्रावधान है सब का उपयोग कीजिए ... चुनाव के माध्यम से सत्ता परिवर्तन कीजिए ... आपके सार्थक विरोध का सर्वदा स्वागत है पर आप तो ऐसे के साथ खड़े दिख रहे हैं जिस की विचारधारा बलेट नहीं बुलेट की बात करती है, ये और बात की आज वो खुद चुनाव के माध्यम से अपनी उस विध्वंसकारी छवि को सुधारने में लगा है | 

राजनीतिक विरोध करते करते राष्ट्र का विरोध न कीजिए ... याद रखिए यह राष्ट्र रहेगा तभी आप किसी कन्हैया को अपनी कविता का नायक बना पाएंगे |
 
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और हाँ आप की अभिव्यक्ति की आज़ादी पूर्णत: सुरक्षित है इस लिए वो स्यापा न करें | इस पोस्ट की आवश्यकता इस लिए हुई क्यूँकि आप के ब्लॉग पर अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं है, कमेन्ट मोडरेशन लगा हुआ है | वैसे भी केवल सहमति के स्वर सुनने की आप की आदत से मैं भली भांति परिचित हूँ |
 
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जागो सोने वालों ...
 

शुक्रवार, 25 जनवरी 2019

विरोध के निशाने पर राष्ट्रीय पर्व ही क्यूँ !?

आप को बहुत सी शिकायतें है ... मैं सहमत हूँ उनका भी समाधान होना चाहिए ... पर राष्ट्रीय पर्व की कीमत पर नहीं ... गणतंत्र दिवस की कीमत पर नहीं ... इस बार भी कुछ मति भृष्ट लोगों से सुना कि इसका बहिष्कार किया जाये ... पर क्यों ... किस कारण से ... ऐसा नया क्या हो गया इस बार कि उस की सज़ा गणतंत्र दिवस को दी जाये ... जो मुद्दे आज आप उठा रहे हैं इस से पहले भी मौजूद थे आगे भी रहेंगे ... क्यों कि हम मुद्दे तो उठाते हैं उसके निवारण हेतु आवश्यक कदम नहीं उठाते ... कुछ लोग तर्क देंगे कि वो इस सरकार से नाराज़ है ... देश मे बिगड़ती कानून व्यवस्था के प्रति उनमें रोष है ... सब के अपने अपने तर्क है ... सब तर्क जायज है पर एक हद तक ! 

सच बताइएगा आप मे से कितनों ने नया साल नहीं मनाया ... किसी को मुबारकबाद नहीं दी न किसी से ली ... आप के खुद के घर मे किसी का जन्मदिन आया हो आपने न मनाया हो ! होता क्या है कि हम लोग यह सब तो मना लेते है पर देश से जुड़े हुये किस मामले पर अपनी पकड़ अक्सर ढीली हो जाती है ... सारा गुस्सा राष्ट्रीय पर्व न मना कर या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान कर ठंडा कर लिया जाता है !

आप सरकार से रुष्ट हो सकते है पूरा अधिकार है आपको ... राजनीतिक तौर पर आप विभिन्न प्रकार से अपना रोष प्रकट करें पर राष्ट्रीय पर्व से रुष्ट होना और उसका असम्मान करना ... केवल मूर्खता है ! विरोध सरकार का कीजिये ... कौन रोकता है ... सीधा राष्ट्र और राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान पर उतर आना कहाँ की समझदारी है ... ऊपर से तुर्रा यह कि इन सब के बाद भी खुद को देश भक्त कहलवाना है !

गणतंत्र दिवस का अपमान हमारा और आपका अपमान है, ये गणतंत्र हमारे और आपके बिना अस्तित्व में नहीं आया। जो इसको अपमानित करने की बात करते हैं वो सीधे तौर पर हमें अपमानित करने की साजिश रच रहे हैं, ऐसे लोगों का मुखर विरोध करें।

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राष्ट्र है तो हम हैं, हम हैं तो राष्ट्र है। हमारी पहली पहचान हमारा राष्ट्र है तद्पश्चात कुछ और। अपने भारतीय होने पर गर्व कीजिए और किसी भी प्रकार के प्रलापों पर ध्यान न देते हुए आगामी गणतंत्र दिवस को विधिवत रूप में मनाएं।
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जागो सोने वालों ...

बुधवार, 14 नवंबर 2018

बाल दिवस और बाल श्रम

 
फिल्म इस्माइल पिंकी ने पिंकी को भले ही शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचा दिया फिर पिंकी की सहायता करने वालों की एक लंबी फेहरिस्त तैयार हो गई बावजूद इसके आज पिंकी का क्या हुआ वह क्या कर रही है, यह अब शायद ही कोई जानता हो । 

आज भी ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पिंकी जैसी अनेकों बालक बालिकाएं हैं जिन्हे बचपन में ही स्कूल जाने की बजाय काम पर लगा दिया जाता है जबकि एक तरफ सरकार जहां बच्चों को कुपोषण से बचाने, उन्हे साक्षर करने के दावे कर रही है यहीं नहीं उसने बाल श्रम पर भी रोक लगाई है, बावजूद इसके बाल श्रम बदस्तूर जारी है। 

हमारे आस पास ही देख लीजिये आपको ऐसी न जाने कितनी पिंकी और छोटू मिल जाएंगे ! गली के नुक्कड़ की चाय की दुकान हो या हाइवे का ढ़ाबा यह छोटू आप को हर जगह मिल जाता है आप चाहे या न चाहे ... और तो और कभी कभी तो आपके घर तक आ जाता है जैन साहब की दुकान से आप के महीने के राशन की 'फ्री होम डिलिवरी' करने ... कैसे बचेंगे आप और हम इस से ... कभी सोचा है !!??
 
ऐसे में आज जब देश भर में विभिन्न संगठनों द्वारा बाल दिवस मनाया जा रहा हो तो यह सवाल पैदा होता है कि क्या किसी के भी जहन में इन मासूमों का ख़्याल आया ... ये सारे संगठन बाल अधिकारों, कुपोषण , सर्व शिक्षा जैसे मुद्दों का झण्डा उठाए बच्चों को उनका हक़ दिलवाने की बात करते थकते नहीं हैं पर कोई भी इन बाल मजदूरों के हक़ की बात नहीं करता ... कोई ऐसा प्रयास होता नहीं दिखता कि देश में बाल मजदूरी बंद हो जाए ... पूछा जाए तो सब ज़िम्मेदारी सरकारों पर डाल कर कोई खुद को पाक साफ़ दिखाता है |

भारत से बाल मजदूरी तब तक बंद नहीं होगी जब तक हम सब मिल कर इस का विरोध नहीं करते | हम में से हर एक को हर स्तर पर बाल मजदूरी का विरोध करना चाहिए| जहाँ भी बाल मजदूरी होती दिखे यदि स्वंय विरोध न कर पावें तो तुरंत प्रशासन या ऐसा किसी संगठन को सूचित करें जो बाल मजदूरों को मुक्त करवा उन्हें समाज में पुनः स्थापित करने के लिए प्रयासरत हैं
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जिस दिन इन जैसे मासूमों को मजदूर बनने से बचा लेना ... मेरे दोस्त जी भर बाल दिवस के गीत गा लेना !!
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जागो सोने वालों ...

रविवार, 17 जून 2018

हमारे बुजुर्ग और फदर्स डे

आज जून महीने का तीसरा रविवार है ... हर साल की तरह इस साल भी जून का यह तीसरा रविवार फदर्स डे  के रूप मे मनाया जा रहा है ... पर क्या सिर्फ एक दिन पिता को समर्पित कर क्या हम सब उस के कर्ज़ से मुक्त हो सकते है ... क्या यही है क्या वास्तव मे हमारा संतान धर्म ??? क्या इतना काफी है उस पिता के लिए जिस ने हमें जन्म दिया ... हमें अपने पैरों पर खड़ा होने के काबिल बनाया !!??

एक रिपोर्ट के अनुसार कहने को तो हमारे देश में बुजुर्गो की बड़ी इज्जत है, मगर हकीकत यह है कि वे घर की चारदीवारियों के अंदर भी बेहद असुरक्षित हैं। 23 फीसदी मामलों में उन्हें अपने परिजनों के अत्याचार का शिकार होना पड़ रहा है। आठ फीसदी तो ऐसे हैं, जिन्हें परिवार वालों की पिटाई का रोज शिकार होना पड़ता है।

बुजुर्गो पर अत्याचार के लिहाज से देश के 24 शहरों में तमिलनाडु का मदुरई सबसे ऊपर पाया गया है, जबकि उत्तर प्रदेश का कानपुर दूसरे नंबर पर है। गैर सरकारी संगठन हेल्प एज इंडिया की ओर से कराए गए इस अध्ययन में 23 फीसदी बुजुर्गो को अत्याचार का शिकार पाया गया। सबसे ज्यादा मामलों में बुजुर्गो को उनकी बहू सताती है। 39 फीसद मामलों में बुजुर्गो ने अपनी बदहाली के लिए बहुओं को जिम्मेदार माना है।

बूढ़े मां-बाप पर अत्याचार के मामले में बेटे भी ज्यादा पीछे नहीं। 38 फीसदी मामलों में उन्हें दोषी पाया गया। मदुरई में 63 फीसदी और कानपुर के 60 फीसदी बुजुर्ग अत्याचार का शिकार हो रहे हैं। अत्याचार का शिकार होने वालों में से 79 फीसदी के मुताबिक, उन्हें लगातार अपमानित किया जाता है। 76 फीसदी को अक्सर बिना बात के गालियां सुनने को मिलती हैं।

69 फीसदी की जरूरतों पर ध्यान नहीं दिया जाता। यहां तक कि 39 फीसदी बुजुर्ग पिटाई का शिकार होते हैं। अत्याचार का शिकार होने वाले बुजुर्गो में 35 फीसदी ऐसे हैं, जिन्हें लगभग रोजाना परिजनों की पिटाई का शिकार होना पड़ता है। हेल्प एज इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मैथ्यू चेरियन कहते हैं कि इसके लिए बचपन से ही बुजुर्गो के प्रति संवेदनशील बनाए जाने की जरूरत है। साथ ही बुजुर्गो को आर्थिक रूप से सबल बनाने के विकल्पों पर भी ध्यान देना होगा।

आज के दिन इन खबरों के बीच याद आती है स्व॰ ओम व्यास 'ओम' जी की यह कविता ...

पापा हार गए…
रात-ठण्ड की
बिस्तर पर
पड़ी रजाईयों को अखाडा बनाता
मेरा छोटा बेटा पांच बरस का |
अक्सर कहता है -
पापा ! ढिशुम-ढिशुम खेले ?
और उसकी नन्ही मुठ्ठियों के वार से मै गिर पड़ता हूँ … धडाम
वह खिलखिला कर खुश हो कर कहता है .... ओ पापा हार गए |
तब मुझे
बेटे से हारने का सुख महसूस होता है |
आज, मेरा वो बेटा जवान हो कर ,
ऑफिस से लौटता है, फिर
बहू की शिकायत पर, मुझे फटकारता है
मुझ पर खीजता है,
तब मै विवश हो कर मौन हो जाता हूँ
अब मै बेटे से हारने का सुख नहीं,
जीवन से हारने का दुःख अनुभूत करता हूँ
सच तो ये है कि
मै हर एक झिडकी पर तिल तिल मरता हूँ |
बेटा फिर भी जीत जाता है,
समय अपना गीत गाता है …

मुन्ना बड़ा प्यारा, आँखों का दुलारा
कोई कहे चाँद कोई आँखों का तारा
- स्व॰ ओम व्यास ‘ओम’

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आज के दिन आइये एक संकल्प लें कि हमारे रहते कभी पापा को यह नहीं कहना पड़ेगा कि................. "मैं हार गया !"
 
आप सभी को पितृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाऎँ !!
 
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जागो सोने वालों ...

मंगलवार, 12 जून 2018

१२ जून - विश्व बालश्रम दिवस

आज १२ जून है ... विश्व भर में बालश्रम दिवस 12 जून को मनाया जाता है।
भारत में भी बालश्रम की समस्या दशकों से प्रचलित है। भारत सरकार ने बालश्रम की समस्या को समाप्त कदम उठाए भी हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23 खतरनाक उद्योगों में बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाता है।
भारत की केंद्र सरकार ने 1986 में बालश्रम निषेध और नियमन अधिनियम पारित कर दिया। इस अधिनियम के अनुसार बालश्रम तकनीकी सलाहकार समिति नियुक्त की गई। इस समिति की सिफारिश के अनुसार, खतरनाक उद्योगों में बच्चों की नियुक्ति निषिद्ध है। 1987 में, राष्ट्रीय बालश्रम नीति बनाई गई थी। पर क्या यह समितियाँ या इन में निर्धारित की गई नीतियाँ बाल श्रम को रोक पाए !?

सन २००८ में आई लगभग ४० मिनट की एक फिल्म इस्माइल पिंकी ने पिंकी को भले ही शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचा दिया और फिर पिंकी की सहायता करने वालों की एक लंबी फेहरिस्त तैयार हो गई बावजूद इसके आज पिंकी का क्या हुआ वह क्या कर रही है, यह अब शायद ही कोई जानता हो । आज भी ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पिंकी जैसी अनेकों बालक बालिकाएं हैं जिन्हे बचपन में ही स्कूल जाने की बजाय काम पर लगा दिया जाता है जबकि एक तरफ सरकार जहां बच्चों को कुपोषण से बचाने, उन्हे साक्षर करने के दावे कर रही है यहीं नहीं उसने बाल श्रम पर भी रोक लगाई है, बावजूद इसके बाल श्रम बदस्तूर जारी है। 

हमारे आस पास ही देख लीजिये आपको ऐसी न जाने कितनी पिंकी और छोटू मिल जाएंगे ! गली के नुक्कड़ की चाय की दुकान हो या हाइवे का ढ़ाबा यह छोटू आप को हर जगह मिल जाता है आप चाहे या न चाहे ... और तो और कभी कभी तो आपके घर तक आ जाता है जैन साहब की दुकान से आप के महीने के राशन की 'फ्री होम डिलिवरी' करने ... कैसे बचेंगे आप और हम इस से ... कभी सोचा है !!??
 
ऐसे में जब देश भर में विभिन्न संगठनों द्वारा हर १ मई को मजदूर दिवस मनाया जाता हो तो यह सवाल पैदा होता है कि क्या किसी के भी जहन में इन मासूमों का ख़्याल आया ... ये सारे संगठन मजदूरों को उनका हक़ दिलवाने की बात करते थकते नहीं हैं पर कोई भी इन बाल मजदूरों के हक़ की बात नहीं करता ... कोई ऐसा प्रयास होता नहीं दिखता कि देश में बाल मजदूरी बंद हो जाए ... पूछा जाए तो सब ज़िम्मेदारी सरकारों पर डाल कर हर कोई खुद को पाक साफ़ दिखाता है |

भारत से बाल मजदूरी तब तक बंद नहीं होगी जब तक हम सब मिल कर इस का विरोध नहीं करते | हम में से हर एक को हर स्तर पर बाल मजदूरी का विरोध करना चाहिए| जहाँ भी बाल मजदूरी होती दिखे यदि स्वंय विरोध न कर पावें तो तुरंत प्रशासन या ऐसा किसी संगठन को सूचित करें जो बाल मजदूरों को मुक्त करवा उन्हें समाज में पुनः स्थापित करने के लिए प्रयासरत हैं | 
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जिस दिन इन जैसे मासूमों को मजदूर बनने से बचा लेना ... मेरे दोस्त जी भर मजदूर दिवस के गीत गा लेना !!
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जागो सोने वालों ...