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सोमवार, 20 अप्रैल 2015

नेताजी रहस्य गाथा

एक जमाना था जब 'मिशन नेताजी' से जुड़े श्री अनुज धर जी और मेरे जैसे उनके सभी साथी अक्सर बड़ी बेबसी से गुनगुनाया करते थे ... "कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले" !!

यह वो दौर था जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की गुमशुदगी से जुड़ी कोई भी ख़बर कहीं भी पढ़ने या देखने को नहीं मिलती थी ... और अगर हम कुछ चुनिन्दा लोगो को छोड़ दें तो किसी को इस बात की कोई परवाह भी नहीं थी कि भारत की आज़ादी के इस महानायक के साथ आखिर हुआ क्या था और उस के लिए कौन जिम्मेदार था ... नेताजी से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक करवाने की मांग तो भला करता ही कौन !?


पिछले दिनों जब नेताजी से जुड़ी २ फाइलें सार्वजनिक की गई तो जैसे हड़कंप सा आ गया जबकि उन फाइलों मे केवल इतना ही छिपा था कि दो दशकों से ज्यादा समय तक नेताजी के परिवार और उनके परिजनों पर गुप्तचर एजेंसियाँ द्वारा जासूसी कारवाई गई और ऐसा तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कहने पर किया गया |
जो लोग इस मुद्दे से जुड़े हुये है वो जानते है कि यह जानकारी केवल 'हाथी की पुंछ' का बाल भर है पूरा हाथी तो अभी सामने आया भी नहीं| ऐसी लगभग ६५ फाइलें है जिन मे इस साजिश का पूरा कच्चा चिठ्ठा लिखा रखा है | ज़रा सोचिए अगर केवल २ फाइलों के सार्वजनिक होने पर भारतीय आज़ादी के इतिहास की छवि बदलती दिख रही है तो सारी फाइलों के सार्वजनिक होने पर क्या होगा !?

RTI के माध्यम से और बाकी सूत्रों से काफी जांच पड़ताल के बाद अनुज धर जी ने इस जटिल गुत्थी को सुलझाने में एक दशक से ज़्यादा समय लगा दिया कि आखिर नेताजी बोस के साथ हुआ क्या !?


'नेताजी रहस्य गाथा' एक विस्तृत खोज है भारतीय राजनीती के सबसे लंबे समय तक चलने वाले विवाद की। दशको से भारतवासी जानना चाहते हैं कि आखिर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को क्या हुआ। क्या नेताजी एक विमान दुर्घटना में मारे गऐ थे, या रूस में उनका अंत हुआ या फिर सन् 1985 तक वह, गुपचुप गुमनामी बाबा बनकर उत्तर प्रदेश रहे।


'नेताजी रहस्य गाथा' उनकी अंग्रेजी पुस्तक India's Biggest Cover-up का हिंदी अनुवाद है। यह उन रहस्यमयी कड़ियों को जोड़ती है जो अब तक अनसुलझी रही थी।

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यह पुस्तक नेताजी की कथित मृत्यु को लेकर अपनाए गए भारत सरकार के षड्यंत्रकारी रवैये की पोल खोलती है। पुस्तक में देश-विदेश से तमाम दुर्लभ जानकारियाँ प्राप्त की गयी हैं, जिसमें कई गोपनीय दस्तावेज़ भी शामिल हैं। नेताजी से जुड़े रहस्य को जानने और नेहरू से मोदी युग तक के राजनैतिक पहलू को समझने के लिए इस पुस्तक का कोई सानी नहीं है। जो भी इस मुद्दे के बारे मे जानकारी लेने के इच्छुक है उनको यह पुस्तक जरूर पढ़नी चाहिए |
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जागो सोने वालों ...
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शनिवार, 5 जुलाई 2014

असली अल्पसंख्यक कौन !?

मैं इस कोशिश मे था कि इस मुद्दे को न छेड़ूँ ... पर मीडिया और आस पास लोगों मे बार बार चर्चा होते देख रहा न गया | वैसे भी मुरादाबाद मेरी ननिहाल है तो उस हक़ से ही सही मैं अपनी बात रख रहा हूँ |

कहा जा रहा है कि मुरादाबाद मे जो हुआ वो "धार्मिक भावनाओं" को "आहात" होने से बचाने के लिए किया गया | पर अगर आप पूरे मामले को देखे तो धार्मिक भावनाएं तो आहात हुई ही ... एक की न हुई तो दूसरे की सही |

अब मेरे हिसाब से इस मामले मे कुछ जरूरी बातों पर अगर ध्यान दिया जाता तो मामला इतना न बिगड़ता |

लॉजिक दिया जाता है कि "अल्पसंख्यक" समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहात हो रही थी इस कारण मंदिर का लाउडस्पीकर उतारा गया ... पर गौर करने की बात यह है उस इलाके मे यही "अल्पसंख्यक" पूरी आबादी का लगभग ८० % हिस्सा है तो फिर असली अल्पसंख्यक कौन हुआ और पूरे मामले मे किस की भावनाएं ज्यादा आहात होती दिख रही है | स्थानीय लोगो ने पूरे मामले मे प्रशासन को दोषी ठहराया है | क्या प्रशासन ने इस मामले मे सच मे 'अल्पसंख्यक समुदाय की धार्मिक भावनाएं' आहात होने से बचाई !?

मुझे तो नहीं लगता ... और यह मैं केवल एक नागरिक के नाते कह रहा हूँ ... अखबार और मीडिया से प्राप्त जानकारी के आधार पर ... इस को मेरे हिन्दू होने या किसी राजनीतिक दल विशेष के समर्थक होने से न जोड़ें | हिन्दू या किसी दल विशेष के समर्थक होने के नाते लिखने बैठे तब तो फिर न जाने क्या क्या लिख बैठें |

रायता फ़ैला कर बाद मे इलाके के लोगों को साथ बैठा शांति स्थापना के लिए जो चर्चा शासन और प्रशासन ने माहौल बिगड़ने के बाद शुरू की क्या वो मंदिर से लाउडस्पीकर उतारने से पहले नहीं जा सकती थी ... क्या आपसी विचार विमर्श के बाद बिना किसी हिंसा के मामला सुलझ न गया होता !?

मुरादाबाद, जिसका की धार्मिक दंगों का एक अच्छा खासा इतिहास रहा है, जैसे इलाके मे प्रशासन ने केवल पूर्वाग्रह से ग्रसित हो जो कदम उठाया उसी के कारण आज एक बार फिर वहाँ का माहौल खराब हुआ है |  

उत्तर प्रदेश वैसे भी पिछले कुछ अरसे से खासा संवेदनशील हो गया है ज़रा सा भी माहौल बिगड़ता है तो लोग उसका भरपूर लाभ लेने को तैयार दिखते है ... फिर चाहे वो राजनीतिक दलों के हो या असामाजिक तत्व ... ऐसे मे शासन और प्रशासन की ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती है कि इस तरह के मामलों मे ज्यादा से ज्यादा संवेदनशील हो कर काम करें ताकि प्रदेश मे चैन और अमन रहे |

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राज्य सरकार खुद को अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध बताती है पर अल्पसंख्यक कौन है पहले इस का निर्धारण सटीकता से होना चाहिए ... यह जरूरी नहीं कि हर जगह एक ही धर्म या समुदाय के लोग ही अल्पसंख्यक हो ... हर इलाके की जनसंख्या के अनुसार इस का निर्धारण किया जाना चाहिए ताकि किसी के भी साथ अन्याय न हो | 

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जागो सोने वालों ...