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रविवार, 19 जून 2016

सिर्फ़ एक ही दिन 'फदर्स डे' क्यूँ !?

Posted by at 5:05 pm
आज जून महीने का तीसरा रविवार है ... हर साल की तरह इस साल भी जून का यह तीसरा रविवार फदर्स डे  के रूप मे मनाया जा रहा है ... पर क्या सिर्फ एक दिन पिता को समर्पित कर क्या हम सब उस के कर्ज़ से मुक्त हो सकते है ... क्या यही है क्या वास्तव मे हमारा संतान धर्म ??? क्या इतना काफी है उस पिता के लिए जिस ने हमें जन्म दिया ... हमें अपने पैरों पर खड़ा होने के काबिल बनाया !!??

एक रिपोर्ट के अनुसार कहने को तो हमारे देश में बुजुर्गो की बड़ी इज्जत है, मगर हकीकत यह है कि वे घर की चारदीवारियों के अंदर भी बेहद असुरक्षित हैं। 23 फीसदी मामलों में उन्हें अपने परिजनों के अत्याचार का शिकार होना पड़ रहा है। आठ फीसदी तो ऐसे हैं, जिन्हें परिवार वालों की पिटाई का रोज शिकार होना पड़ता है।

बुजुर्गो पर अत्याचार के लिहाज से देश के 24 शहरों में तमिलनाडु का मदुरई सबसे ऊपर पाया गया है, जबकि उत्तर प्रदेश का कानपुर दूसरे नंबर पर है। गैर सरकारी संगठन हेल्प एज इंडिया की ओर से कराए गए इस अध्ययन में 23 फीसदी बुजुर्गो को अत्याचार का शिकार पाया गया। सबसे ज्यादा मामलों में बुजुर्गो को उनकी बहू सताती है। 39 फीसद मामलों में बुजुर्गो ने अपनी बदहाली के लिए बहुओं को जिम्मेदार माना है।

बूढ़े मां-बाप पर अत्याचार के मामले में बेटे भी ज्यादा पीछे नहीं। 38 फीसदी मामलों में उन्हें दोषी पाया गया। मदुरई में 63 फीसदी और कानपुर के 60 फीसदी बुजुर्ग अत्याचार का शिकार हो रहे हैं। अत्याचार का शिकार होने वालों में से 79 फीसदी के मुताबिक, उन्हें लगातार अपमानित किया जाता है। 76 फीसदी को अक्सर बिना बात के गालियां सुनने को मिलती हैं।

69 फीसदी की जरूरतों पर ध्यान नहीं दिया जाता। यहां तक कि 39 फीसदी बुजुर्ग पिटाई का शिकार होते हैं। अत्याचार का शिकार होने वाले बुजुर्गो में 35 फीसदी ऐसे हैं, जिन्हें लगभग रोजाना परिजनों की पिटाई का शिकार होना पड़ता है। हेल्प एज इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मैथ्यू चेरियन कहते हैं कि इसके लिए बचपन से ही बुजुर्गो के प्रति संवेदनशील बनाए जाने की जरूरत है। साथ ही बुजुर्गो को आर्थिक रूप से सबल बनाने के विकल्पों पर भी ध्यान देना होगा।

आज के दिन इन खबरों के बीच याद आती है स्व॰ ओम व्यास 'ओम' जी की यह कविता ...

पापा हार गए…
रात-ठण्ड की
बिस्तर पर
पड़ी रजाईयों को अखाडा बनाता
मेरा छोटा बेटा पांच बरस का |
अक्सर कहता है -
पापा ! ढिशुम-ढिशुम खेले ?
और उसकी नन्ही मुठ्ठियों के वार से मै गिर पड़ता हूँ … धडाम
वह खिलखिला कर खुश हो कर कहता है .... ओ पापा हार गए |
तब मुझे
बेटे से हारने का सुख महसूस होता है |
आज, मेरा वो बेटा जवान हो कर ,
ऑफिस से लौटता है, फिर
बहू की शिकायत पर, मुझे फटकारता है
मुझ पर खीजता है,
तब मै विवश हो कर मौन हो जाता हूँ
अब मै बेटे से हारने का सुख नहीं,
जीवन से हारने का दुःख अनुभूत करता हूँ
सच तो ये है कि
मै हर एक झिडकी पर तिल तिल मरता हूँ |
बेटा फिर भी जीत जाता है,
समय अपना गीत गाता है …

मुन्ना बड़ा प्यारा, आँखों का दुलारा
कोई कहे चाँद कोई आँखों का तारा
- स्व॰ ओम व्यास ‘ओम’

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आज के दिन आइये एक संकल्प लें कि हमारे रहते कभी पापा को यह नहीं कहना पड़ेगा कि................. "मैं हार गया !"
आप सभी को पितृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाऎँ !!
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जागो सोने वालों ...

बुधवार, 18 मई 2016

साल भर मे भुला दी गई अरुणा शानबाग

Posted by at 7:59 pm
अरुणा शानबाग ... हम मे से बहुतों ने पिछली साल आज ही के दिन पहली बार इस नाम और इस नाम से जुड़ी शख़्सियत के बारे मे जाना था | पर अफ़सोस कि इस जान पहचान के पीछे कोई भी सुखद कारण नहीं था | 

पिछले साल आज ही के दिन खबरों की सुर्खियों मे अपनी थोड़ी सी जगह बनाने वाली अरुणा शानबाग का निधन हो गया था ... लगातार 42 वर्षों तक कोमा में रहने के बाद अरुणा को अंतत: मौत नसीब हुई| अरुणा का निधन 18 मई 2015 की सुबह लगभग 10 बजे केईएम अस्पताल में हुआ, वह 67 वर्ष की थीं| वह पिछले 42 वर्षों से इसी अस्पताल में जिंदगी से जूझ रहीं थीं| निधन से कुछ दिनों पूर्व उन्हें निमोनिया हो गया था और फेफड़े में भी संक्रमण था और वह जीवनरक्षक प्रणाली पर थीं |

कौन थीं अरुणा शानबाग !?

अरुणा शानबाग केईएम अस्पताल मुंबई में काम करने वाली एक नर्स थीं ... जिनके साथ 27 नवंबर 1973 में अस्पताल के ही एक वार्ड ब्वॉय ने यौन अपराध किया था| उस वार्ड ब्वॉय ने यौन शोषण के दौरान अरुणा के गले में एक जंजीर बांध दी थी ... उसी जंजीर के दबाव से अरुणा उस घटना के बाद कोमा में चली गयीं और फिर कभी सामान्य नहीं हो सकीं| उस घटना के बाद लगातार 42 वर्षों तक अरुणा शानबाग कोमा में थीं ... अरुणा की स्थिति को देखते हुए उनके लिए इच्छा मृत्यु की मांग करते हुए एक याचिका भी दायर की गयी थी, लेकिन कोर्ट ने इच्छामृत्यु की मांग को ठुकरा दिया था| अरुणा की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करने वाले दरिंदे का नाम सोहनलाल था, जिसे कोर्ट ने सजा तो दी, लेकिन वह अरुणा के साथ किये गये अपराध के मुकाबले काफी कम थी| 

अरुणा को नहीं मिला था न्याय !!

अरुणा के साथ जब सोहनलाल ने दरिंदगी की, उसके पहले अरुणा शादी का निश्चय कर चुकी थी और जल्दी ही उनकी शादी होने वाली थी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था| सोहनलाल अरुणा की जिंदगी में काल बनकर आया और सबकुछ तहस-नहस कर गया, लेकिन अरुणा के साथ हुए यौन शोषण के मामले को कुछ और ही रूप दिया गया था ... अस्पताल के डीन डॉक्टर देशपांडे ने डकैती और लूटपाट का केस दर्ज कराया, अरुणा की बदनामी ना हो, इसलिए यौन शोषण के केस को दबाया गया, जिसके कारण सोहनलाल को सिर्फ सात साल की सजा हुई और उसके बाद वह आजाद हो गया, जबकि अरुणा शानबाग 42 वर्षों तक उसके कुकर्म की सजा भोगती रही | हमारी न्याय व्यवस्था और समाज के लिए यह एक बहुत बड़ा कलंक है| विडंबना यह कि अपराधी तो 7 साल की सज़ा के बाद बरी हो गया पर पीड़िता उस सज़ा से 6 गुना लंबी सज़ा भुगतती रही| 
 
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आज उनकी पहली पुण्यतिथि है पर अफसोस न तो मीडिया को, न ही महिला सुरक्षा और अधिकारों के परोकारों को उनकी याद आई ... कहीं कोई जिक्र नहीं ... साल भर के अंदर ही अरुणा शानबाग भुला दी गई ... जैसे मृत्यु से पहले के 42 सालों तक भुला दी गई थी !! वो अकेली अपनी लड़ाई लड़ती रही, अस्पताल के बिस्तर पर कोमा मे रहते हुये भी ... एक वीर योद्धा की तरह ... 
 
लनात है हम पर ... और हमारे पूरे सिस्टम पर ... जो सुधरने का नाम नहीं लेता ... केवल खोखले कानून बना कर ज़िम्मेदारी ख़त्म नहीं होती ... क़ानूनों का सख़्ती से पलान भी करवाना होता हैं |
 
जब तक ऐसा नहीं होगा ... ऐसी कई अरुणा यूं ही तिल तिल मरती रहेंगी और हम नपुंसकों की तरह बैठे तमाशा देखेंगे ...

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पहली पुण्यतिथि पर मजबूत इरादों वाली अरुणा शानबाग जी को हम सब की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि |
 
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जागो सोने वालों ... 

शुक्रवार, 13 मई 2016

देश बड़ा या राजनीतिक मतभेद

Posted by at 4:06 pm
पिछले कुछ दिनों से एक विकृति संज्ञान में आई है, कुछ लोग भारत माता की जय‬, जय हिन्द‬, वंदे मातरम्‬, इंकलाब ज़िंदाबाद‬ आदि नारों का उपयोग तानों या तंजों की तर्ज़ पर बेहिचक करने लगे हैं।

आप का यदि किसी से राजनितिक विचारधारा या वैचारिक आधार पर मतभेद है तो उस मतभेद के चलते क्या आप इन नारों का और इन से जुड़ी भावनाओं का मखौल उड़ाएंगे !? क्या यह आप को शोभा देता है!? क्या आप को नहीं लगता कि एक प्रकार से आप अपने देश का ही मज़ाक उड़ा रहे हैं!?

ऐसा तो संभव ही नहीं है कि एक भारतीय के तौर पर आप को इन नारों के इतिहास का ज्ञान न हो ... या भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम मे इन नारों के योगदान के बारे मे आप न जानते हों ... और यदि ऐसा है कि आप सच मे इन नारों के योगदान के बारे मे अनजान हैं तो माफ़ कीजिएगा ... यह बड़े शर्म की बात है !!

देश और उस से जुड़ा देशप्रेम किसी भी राजनितिक मतभेद से बड़ा था, है , और रहेगा। कृपया अपनी कुंठाओं के चलते इस के सम्मान का हनन न करें।
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दिल की बात लबों पर लाना मुश्किल है;
सब को सच्ची राह दिखाना मुश्किल है;
सूरज दुनिया को उजियारा देता है मगर;
चमगादड़ को ये समझाना मुश्किल है।
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जागो सोने वालों ...

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

स्वधर्मे निधनं श्रेयः

Posted by at 12:45 pm
आज़ादी मुफ़्त नहीं मिलती, इस की असली कीमत हमारे वीर सैनिक चुकाते हैं। अपने सैनिकों और सेना का सम्मान करना सीखिए।

 
जिन का आदर्श वाक्य, स्वधर्मे निधनं श्रेयः (कर्तव्य पालन करते हुए मरना गौरव की बात है।) हो, उन से इस से कम की कोई अपेक्षा की भी नहीं जा सकती।


"वीरा मद्रासी,अडी कोल्लु अडी कोल्लु!!"
 
(वीर मद्रासी, आघात करो और मारो,आघात करो और मारो!)


पलटन का मान बढ़ा गए यह दसों महावीर।

दिल से सलाम।

जय हिन्द।

जय हिन्द की सेना।
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सरदार पटेल ने कहा था -

"हर भारतीय को याद रखना चाहिए कि अगर इस देश में उन्हें कुछ अधिकार दिए गए हैं तो बदले मे उनके कुछ कर्तव्य भी है।"

एक तरफ यह जाँबाज सैनिक है जो देश के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर देते हैं दूसरी ओर JNU जैसे शिक्षा संस्थानों के तैयार किये गए अधकचरे बुद्धिजीवी है जो न जाने कैसे और किस आधार पर अफ़जल या बाकी किसी आतंकी को शहीद बता कर उनके हिमायती बन भारत विरोधी नारे लगाते है, इन को कभी शहीद सैनिकों का ख़्याल क्यों नहीं आता !?

कभी कभी लगता है, आस्तीन के सांप पाल रहे हैं हम। छात्र राजनीति के नाम पर यह लोग जो कुछ करते दिख रहे हैं उसका छात्रों से कुछ लेना देना नहीं है ... सरकारी अनुदानों के आधार पर पलने वाले यह लोग केवल मौकापरस्त लोगों की वो जमात है जो जिस थाली मे खाती है उसी मे छेद करती है | खुद को 'बुद्धिजीवी' साबित करने के चक्कर मे यह केवल बड़ी बड़ी बातें करते है ... जमीनी स्तर पर काम करता कोई नहीं दिखता ... अगर केवल विरोध प्रदर्शन और नारों के दम पर समाज मे बदलाव आता होता तो पिछले ७ दशकों मे निरे बदलाव आ चुके होते |

 
बदलाव आते है जमीनी स्तर पर काम कर, देश के कुछ कर गुजरने के जज़्बे से | बहुत अधिक नहीं केवल एक आदर्श नागरिक बनने का प्रयास कीजिये, फर्क दिखने लगेगा |
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जागो सोने वालों ...

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