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मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

बेशर्मी की हद है ...

Posted by at 9:07 pm
मैं इस पोस्ट को यहाँ शेअर न भी करूँ तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता ... जनता जानती है यह कोंग्रेसी सरकार, इसके मंत्री और इन सब के सहयोगी कितने संजीदा है इतने गंभीर और संवेदनशील मसले पर ... आप खुद ही देख लीजिये ...
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Itna Serious Matter pe charcha aur Rajiv Shukla has rahe the ???

राज्य सभा में चल रही बहस "क्या बलात्कारियों को फांसी दी जाय" के दौरान राजीव शुक्ला......

समझ में नहीं आ रहा इसके लिये किन शब्दों का इस्तेमान करुं... :/

http://ibnlive.in.com/news/rajya-sabha-discusses-delhi-gangrape-minister-rajeev-shukla-seen-smiling/311056-3-244.html

बलात्कारियों के मनोबल बढ़ाने वाले बयान..

बयान सुनिए...

१) 90 फीसदी लड़कियां मर्जी से करवाती हैं रेप: - हरियाणा कांग्रेस के प्रवक्ता नेता धरमवीर गोयल
२) रेप के कारण चाउमिन और मानसिक पिछड़ापन!: - हरियाणा कांग्रेस पार्टी के नेता संपत सिंह
३) रेप तो पूरे देश में हो रहे हैं: - सोनिया गांधी
४) विपक्ष की साजिश से बढ़े रेप: - हरियाणा कांग्रेस के अध्यक्ष फूलचंद मुलाना
५) हमें सत्ता में लाइए, देंगे बलात्कार भत्ता:- मुलायम सिंह यादव

अब बताइये ... जब जब यह लोग घड़ियाली आँसू बहाने आए तो क्या किया जाये इन जैसों के साथ ???

एक पोस्ट यह भी है ... ज़रा देखिएगा 
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जागो सोने वालों ...

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

राष्ट्रहित मे जानिए क्या है - "India's Biggest Cover-up"

Posted by at 11:33 pm
सन 1945 मे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की तथाकथित हवाई दुर्घटना या उनके जापानी सरकार के सहयोग से 1945 के बाद सोवियत रूस  मे शरण लेने या बाद मे भारत मे उनके होने के बारे मे हमेशा ही सरकार की ओर से गोलमोल जवाब दिया गया है उन से जुड़ी हुई हर जानकारी को "राष्ट्र हित" का हवाला देते हुये हमेशा ही दबाया गया है ... 'मिशन नेताजी' और इस से जुड़े हुये मशहूर पत्रकार श्री अनुज धर ने काफी बार सरकार से अनुरोध किया है कि तथ्यो को सार्वजनिक किया जाये ताकि भारत की जनता भी अपने महान नेता के बारे मे जान सके पर हर बार उन को निराशा ही हाथ आई !

श्री धर ने इस विषय पर समय समय पर पुस्तकें और विभिन्न आलेखों के माध्यम से जनता मे इस मुद्दे को जीवित रखने का प्रयास चलाये रखा है ... 

उनकी हालिया लिखी पुस्तक, "India's Biggest Cover-up"  बहुत ही कम समय मे काफी लोकप्रिय हो गई है ... आज कल मैं भी इसी पुस्तक को पढ़ने मे लगा हुआ हूँ ! जिस प्रकार से श्री धर ने नेता जी से जुड़ी इस गुत्थी को परत दर परत खोलने का प्रयास अपनी इस पुस्तक मे किया है वो सच मे तारीफ के काबिल है ... और ऐसा भी नहीं है कि आपको पढ़ते हुये कहीं से भी ऐसा लगे कि लेखक भावनाओ के आधीन हो कुछ कह रहा है ... जो भी लिखा गया है उसके पीछे उसको साबित करते हुये तथ्य भी दिये गए है !

अभी हाल ही मे अंगेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स मे एक आलेख छपा था जिस मे कि इस पुस्तक मे दिये गए एक चित्र का जिक्र था ... मैं यहाँ उस आलेख का स्कैन किया हुआ चित्र लगा रहा हूँ ताकि आप सब भी उसे पढ़ सकें !
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मेरा आप से एक अनुरोध है कि इस किताब को एक बार जरूर पढ़ें ... भारत के नागरिक के रूप मे अपने देश के इतिहास को जानने का हक़ आपका भी है ... जानिए कैसे और क्यूँ एक महान नेता को चुपचाप गुमनामी के अंधेरे मे चला जाना पड़ा... जानिए कौन कौन था इस साजिश के पीछे ... ऐसे कौन से कारण थे जो इतनी बड़ी साजिश रची गई न केवल नेता जी के खिलाफ बल्कि भारत की जनता के भी खिलाफ ... ऐसे कौन कौन से "राष्ट्र हित" है जिन के कारण हम अपने नेता जी के बारे मे सच नहीं जान पाये आज तक ... जब कि सरकार को सत्य मालूम है ... क्यूँ तथ्यों को सार्वजनिक नहीं किया जाता ... जानिए आखिर क्या है ... 


नोट :- इस पुस्तक को आप घर बैठे भी मँगवा सकते है जैसा कि मैंने किया है ... उसके लिए आप यहाँ दिये हुये लिंक पर जाये और अपना ऑर्डर दे दें !
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जागो सोने वालों ... 

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

कुछ तो है बात जो तहरीरो मे तासीर नहीं ...

Posted by at 1:43 pm
लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश के समक्ष उपस्थित समस्याओं का उल्लेख करते हुए उनका सामना करने की जो प्रतिबद्धता व्यक्त की उसमें कुछ भी नया नहीं है, क्योंकि इस तरह की बातें स्वयं उनकी ओर से इसके पहले भी की जा चुकी हैं। आखिर कब तक केवल समस्याओं से लड़ने की बातें की जाती रहेंगी या फिर उनका उल्लेख किया जाता रहेगा? क्या पिछले नौ वर्ष इसी तरह की बातें सुनते हुए ही नहीं बीते? बतौर उदाहरण, यह न जाने कितनी बार सुनने को मिल चुका है कि सरकार आतंकवाद और नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखेगी। यथार्थ यह है कि ऐसा होता हुआ दिखाई नहीं देता। यह ठीक है कि आंतरिक सुरक्षा को लेकर शीघ्र ही मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन बुलाया जा रहा है, लेकिन पिछले नौ वर्षो में ऐसे सम्मेलन तो कई बार बुलाए जा चुके हैं और सब जानते हैं कि नक्सलवाद में कहीं कोई कमी आती नहीं दिख रही है। इसी तरह यह भी जगजाहिर है कि मुंबई हमले के षड्यंत्रकारी खुले आम घूम रहे हैं। देश यह भी जानता है कि पाकिस्तान से वार्ता के संदर्भ में आतंकवाद पर रोक लगाने की शर्त हटा दी गई है इस पर संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि प्रधानमंत्री ने लालकिले से कमजोर मॉनसून से उत्पन्न कृषि संकट की भी चर्चा की और स्वास्थ्य सुविधायों की भी, क्योंकि न तो कृषि क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के लिए बुनियादी कदम उठाए जा रहे हैं और न ही देश के स्वास्थ्य ढांचे में सुधार के लक्षण दिख रहे हैं। यह एक यथार्थ है कि देश में कृषि और किसानों की दशा वैसी ही है जैसी प्रधानमंत्री के बहुचर्चित विदर्भ दौरे के समय थी।
लालकिले से प्रधानमंत्रियों के संबोधन में जो एकरसता और रस्म अदायगी का भाव आता जा रहा है उसका एक बार फिर विस्तार होता हुआ दिखा। नि:संदेह ऐसे रस्मी उद्बोधन न तो राष्ट्र को कोई दिशा दे सकते हैं और न ही उसमें ऊर्जा एवं उत्साह का संचार कर सकते हैं। यह सही है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ओजपूर्ण भाषण के लिए नहीं जाने जाते और न ही ऐसा भाषण देना आवश्यक है, लेकिन कम से कम इस अवसर पर पुरानी बातें दोहराने का काम भी नहीं होना चाहिए। क्या इस तरह के आश्वासन का कोई मूल्य महत्व रह गया है कि सरकार महिला आरक्षण विधेयक पारित कराने के लिए प्रतिबद्ध है? आखिर उस प्रतिबद्धता का क्या हुआ जो पहले भी  करीब-करीब इन्हीं शब्दों के रूप में दिखाई गई थी? स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में राष्ट्रपति के बाद प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में भ्रष्टाचार को लेकर इन शब्दों में चिंता जताई कि जब तक हमारा सरकारी तंत्र भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं हो जाता, योजनाओं का फायदा जनता तक नहीं पहुंचेगा, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से लोकपाल के संदर्भ में सिर्फ आश्वासन ही मिला। दरअसल जब खुद प्रधानमंत्री की ओर से इस तरह का कुछ सुनने को मिलता है कि ऐसा-ऐसा करने की जरूरत है अथवा यह या वह किया जाना चाहिए तो निराशा कहीं अधिक बढ़ जाती है। क्या जो कुछ भी किया जाना है उसकी पहल शीर्ष स्तर से अपेक्षित नहीं है? 

क्या प्रधानमंत्री के पुराने वादे पूरे हुए हैं ? इस सवाल के जवाब में संप्रग सरकार की दूसरी पारी की शुरुआत में 15 अगस्त, 2009 को दिए प्रधानमंत्री के भाषण को खंगाला गया। प्रस्तुत है तीन साल पहले प्रधानमंत्री द्वारा किए गए वादों और उनकी जमीनी हकीकत की बानगी :
आर्थिक विकास
2009 : 'विकास दर को नौ फीसद पर लाना सबसे बड़ी चुनौती है। उम्मीद है इस साल के अंत तक हालात सुधर जाएंगे।'
2012 : इस साल हम बारहवीं पंचवर्षीय योजना को राष्ट्रीय विकास परिषद के सामने रखेंगे। इसमें उन उपायों का निर्धारण किया जाएगा जिनसे हमारे आर्थिक विकास की दर वर्तमान 6.5 प्रतिशत से बढ़कर योजना के आखिरी साल में नौ प्रतिशत हो जाए।
खाद्य सुरक्षा विधेयक
2009 : हमारा वादा है कि हम एक खाद्य सुरक्षा कानून बनाएंगे जिसके तहत गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले हर परिवार को हर महीने निश्चित मात्रा में रियायती दरों पर अनाज दिया जाएगा।
2012 : खाद्य सुरक्षा कानून अभी तक लागू नहीं हो सका है। दिसंबर, 2011 में लोकसभा में पेश खाद्य सुरक्षा विधेयक में कई संशोधनों पर सरकार की सहयोगी तृणमूल कांग्रेस सहित कई राजनीतिक दल दबाव बना रहे हैं।
आइसीडीएस योजना
2009 : मार्च 2012 तक देश में छह साल से कम उम्र के हर बच्चे तक समेकित बाल विकास योजना का लाभ पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
2012 : अभी तक यह लक्ष्य हासिल नहीं हो पाया है। पीएम ने बुधवार को कहा कि योजना को और प्रभावी बनाने की प्रक्रिया अब आखिरी दौर में है। इसे अगले एक-दो महीने में पूरा कर लिया जाएगा।
स्वास्थ्य
2009 : राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना का विस्तार करेंगे, ताकि गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले हर परिवार को शामिल किया जा सके।
2012 : अभी तक निर्धारित लक्ष्य हासिल नहीं हो सका है।
राजमार्ग
2009 : देश में रोजाना 20 किमी राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने के लिए कार्रवाई शुरू कर दी गई है।
2012 : राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण की दर 10 किमी प्रतिदिन से आगे नहीं बढ़ पा रही है।
नागरिक उड्डयन
2009 : एयर इंडिया की समस्याओं पर हम गंभीरता से गौर कर रहे हैं और जल्द ही उनका समाधान निकल आएगा।
2012 : एयर इंडिया अब भी मुश्किलों से जूझ रही है। बीते तीन सालों में सरकारी विमानन कंपनी में कई हड़तालें हो चुकी हैं। घाटा और बढ़ गया है।
आवास
2009 : देश को झुग्गी-झोपड़ी से मुक्त बनाने के लिए अगले पांच सालों में हम बेहतर आवास सुविधाएं मुहैया कराने के लिए राजीव आवास योजना शुरू करेंगे।
2012 : यह योजना अभी तक अमल का इंतजार कर रही है। पीएम ने अपने भाषण में कहा, सरकार राजीव आवास ऋण योजना की शुरुआत करेगी जिसके तहत आर्थिक रूप से कमजोर तबकों के लोगों को मकान बनाने के लिए पांच लाख रुपये तक के कर्ज पर ब्याज में छूट दी जाएगी।
सांप्रदायिक हिंसा विधेयक
2009 : सांप्रदायिक हिंसा रोकने के लिए संसद में पेश विधेयक को जल्द से जल्द कानून में बदलने की कोशिश की जाएगी।
2012 : विधेयक अभी तक पारित नहीं हो पाया है।
महिला आरक्षण विधेयक
2009 : हमारी सरकार महिला आरक्षण विधेयक को जल्द से जल्द पारित कराने के लिए प्रतिबद्ध है।
2012 : यह विधेयक 2010 में राज्यसभा से तो पारित हो गया, लेकिन लोकसभा में अटका हुआ है।
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एक शेर याद आता है ... 

"  कुछ तो है बात जो तहरीरो मे तासीर नहीं ...

झूठे फनकार नहीं है तो कलम झूठे है !!"
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जागो सोने वालों ...

रविवार, 24 जून 2012

जागो सोने वालों ...

Posted by at 11:36 am
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जागो सोने वालों ...

गुरुवार, 24 मई 2012

संप्रग-2 की तीसरी सालगिरह का रिटर्न गिफ्ट - स्वीकार करें

Posted by at 12:28 pm
कार्टून साभार श्री सुधीर तैलंग 
संप्रग-2 की तीसरी सालगिरह मनाने और कड़े फैसले लेने का ऐलान करने के अगले ही दिन केंद्र सरकार ने आम जनता को अभूतपूर्व पेट्रोल मूल्य वृद्धि का अनचाहा तोहफा दे डाला। तेल कंपनियों ने बुधवार आधी रात से पेट्रोल की खुदरा कीमत में 7.50 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि करने का ऐलान किया है। सरकार के फैसले से विपक्ष ही नहीं सरकार के घटक दल भी गुस्से में हैं। हालांकि देश के इतिहास में इस एकमुश्त सबसे बड़ी मूल्य वृद्धि में सरकार ने इसकी गुंजाइश भी रखी है कि दबाव बढ़ने पर कुछ कमी की जा सके। पिछले तीन साल में पेट्रोल कीमतें 39.51 रुपये बढ़ा चुकी हैं।
ताजा बढ़ोत्तरी के बाद दिल्ली में पेट्रोल की खुदरा कीमत 73.18 रुपये प्रति लीटर हो जाएगी। आशंका है कि जल्द ही आम आदमी पर डीजल व रसोई गैस की कीमत वृद्धि की भी मार पड़ेगी। इस हफ्ते ही अधिकार प्राप्त मंत्रियों के समूह [ईजीओएम] की बैठक में इस बारे में फैसला हो सकता है। पेट्रोल कीमतों में यह बढ़ोत्तरी रुपये में तेज गिरावट का असर मानी जा रही है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतें हाल में घटी हैं, लेकिन रुपये की कमजोरी ने नुकसान घटाने के बजाय बढ़ा दिया है। पिछले एक वर्ष [15 मई, 2011 के बाद] के दौरान पेट्रोल 9.77 रुपये प्रति लीटर महंगा हो चुका है।
संसद के बजट सत्र और तीन वर्ष के कार्यकाल के समारोह के बाद सरकार ने पूरे राजनीतिक नफा-नुकसान का आकलन करने के बाद तेल कंपनियों को कीमत वृद्धि की इजाजत दी है। सरकार ने जून, 2010 में तेल कंपनियों को पेट्रोल की कीमत तय करने की आजादी दी थी। इस ंवर्ष की शुरुआत में तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सरकार के दबाव में तेल कंपनियों को कीमत घटानी पड़ी थी। नवंबर, 2011 में जब पेट्रोल महंगा किया गया था, तब ममता बनर्जी ने सरकार से समर्थन वापस लेने की धमकी भी दी थी। इसके बाद बजट पास होने की मजबूरी से पेट्रोल महंगा नहीं किया गया।
तेल कंपनियों की है 6.28 रुपये वृद्धि
तेल कंपनियों ने पेट्रोल की कीमत में 6.28 रुपये की वृद्धि की है। केंद्र व राज्यों की तरफ से टैक्स लगने की वजह से आम जनता को 7.50 रुपये से 8.25 रुपये का बोझ उठाना पड़ेगा। विभिन्न राज्यों में पेट्रोल पर 15 फीसदी से 33 फीसदी बिक्री कर या वैट वसूला जाता है। तेल कंपनियों ने कहा है कि नवंबर, 2011 के बाद से क्रूड की कीमत में 14 फीसदी वृद्धि होने से उन्हें कीमत बढ़ानी पड़ रही है। इस दौरान डॉलर भी मजबूत हुआ है। इससे क्रूड का आयात महंगा हुआ है। तेल कंपनियों ने कहा है कि उन्हें अपने घाटे की भरपाई के लिए अभी 1.50 रुपये की वृद्धि और करनी पड़ेगी।
(साभार - दैनिक जागरण)

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मुझे कोई तो समझा दो भाई ... काहे इतना बवाल मचा हुआ है ... अरे कोई पहली बार थोड़े ही न बढ़े है दाम पेट्रोल के ... अब तक नहीं समझे आप लोग यह खेल ... अब एक दो दिन मे 'राजमाता' जनहित मे तेल मंत्री की क्लास लेंगी और 5 रुपया कम हो जाएगा दाम पेट्रोल का ... मतलब यह कि जनता को च पर उ की मात्रा मानते हुये यह सब खेल रचा जा रहा है ... सिर्फ 'राजमाता' का जनप्रेम दिखाने के लिए ! तो बवाल न मचाओ ... राष्ट्रहित मे सिर्फ इस 'प्रेम' मे डूब जाओ ... और वैसे भी यह तो बर्थडे पार्टी का  रिटर्न गिफ्ट है यार ... दान में मिली हुई बछिया के दांत कहाँ गिने जाते है महाराज !
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 तेल की धार तो हम सब देख ही रहे है ... यह सरकार अब जनता की धार देखेगी ... बस थोड़ा सा इंतज़ार करो !
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जागो सोने वालों ...

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