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शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

महिला प्रधान और काम काज करते हैं परिजन

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सरकार की मंशा भले ही पंचायतों में ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को प्रधानी के लिए आरक्षण हो लेकिन हकीकत है कि अधिकांश महिलाएं आज भी प्रधान होते हुए भी चौका चूल्हे तक सीमित हैं। प्रधान चुनकर भी वे नारी सशक्तिकरण को साकार नहीं कर पाती स्थित यह है कि अधिकांश महिला प्रधानों के कार्य उनके पति भाई या अन्य सहयोगी ही निपटाते हैं अब जब महिलाओं का आरक्षण बढ़ाने की बात हो रही है। तो फिर स्थित क्या होगी इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
मैनपुरी के बेवर ब्लाक क्षेत्र में कई ग्राम पंचायतों में बीते चुनावों में महिला सीट आरक्षित हो गयी तो प्रधान जी ने पत्‍‌नी को उम्मीदवार बना दिया और वह प्रधान चुन भी ली गयी। पर पंचायत के काम काज से उनका कोई मतलब नहीं रहा। प्रधानों की बैठक में आयीं भी तो अनजान बनी बैठी रही। प्रधानी का पूरा काम उनके भाई या पति ही देखते रहे। प्रधानी कार्यकाल का पांच साल बीतने को है पर कई महिला प्रधान घूंघट की ओट से ही प्रधानी करती रही | न खुली बैठक में सवालों के जवाब देना और न समस्याओं के लिए मुख्यालय के चक्कर लगाना | कही मौजूदगी जरुरी हुई तो पति के पास मूर्ति बनकर खड़े हो गये। ब्लाक क्षेत्र में ऐसी कई ग्राम पंचायतें हैं। जहां महिला प्रधान है जब भी गांव के विकास कार्यो की समीक्षा के लिए उच्चाधिकारी आते हैं तो महिला प्रधान नजर नहीं आती अधिकारियों को मौका मुआयना कराने और उन्हें संतुष्ट करने का काम उनके पति के जिम्मे रहता है।
हकीकत तो यह है ग्राम पंचायतों में चुनी गयी अधिकांश महिला प्रधानों को पंचायत की राजनीति में न तो पहले दिलचस्पी थी न प्रधानी के बाद | उन्होंने तो सिर्फ पति के आदेश का पालन किया अब भला पंचायत राज अधिनियम की धाराएं उनके सिर से ऊपर होकर क्यों न निकले वैसे भी पति देव प्रधानी चलाते चलाते इतने निपुण हो गये कि प्रधान जी को दस्तखत करने का कष्ट तब तक नहीं देते जब तक बहुत जरुरी न हो या कोई कानूनी पचड़ा न हो | ऐसा भी नहीं कि अधिकारियों को इसकी जानकारी न हो, कई ग्राम पंचायतों में खुली बैठकों में महिला प्रधान के स्थान पर उनके पति सवालों के जवाब व लेखा जोखा पेश करते हैं। स्थित यह है कि महिला प्रधान के हस्ताक्षर कराना भी उनके पति जरुरी नहीं समझते हैं। 
खैर साहब हमें क्या,...अपनी तो सिर्फ आदत है कहेने की ...जागो सोने वालो.....

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